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कुछ यूं खत्म हुआ 5वें फेस्टिवल ऑफ लेटर्स का सफर

Tue, 11 Feb 2014 03:13 PM IST
शंकर सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़
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तीन दिन में भारत के दस मशहूर लेखकों की साहित्य यात्रा का सफर पंजाब यूनिवर्सिटी के इंग्लिश डिपार्टमेंट के आडिटोरियम में समाप्त हुआ।
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चंडीगढ़ साहित्य अकादमी की ओर से आयोजित फेस्टिवल ऑफ लेटर्स के अंतिम दिन हाल ही में अपनी पहली नावेल निर्वाण से साहित्य अकादमी पुरस्कार पा चुके पंजाबी लेखक डा. मनमोहन सिंह और दिल्ली की लेखिका गीतांजलि लेखन पर विचार चर्चा से हुई।

कवि व लेखक डा. मनमोहन सिंह ने बताया कि पुलिस की ड्यूटी के दौरान कई ऐसे स्थानों पर भी रहा जहां बुद्ध से जुड़ा साहित्य बेहद प्रचलित था। बिहार में गया और झारखंड में रहते हुए बुद्ध से जुड़े साहित्य की जानकारी मिली और ‘निर्वाण’ की शुरुआत हुई।
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2002 में लिखे नॉवेल निर्वाण की कहानी बुद्ध और माडर्न बुद्ध की सोच और उसके बीच के द्वंद्व को दिखाती है। लेखक डा.आत्मजीत सिंह के साथ चर्चा में शामिल होते हुए डा. मनमोहन सिंह ने बताया की बचपन मे माता-पिता के अलग हो जाने पर वे मां के साथ ही रहते थे, जिसकी वजह से बचपन से ही उनका स्वभाव थोड़ा गंभीर था।

घर से यह दबाव था कि अपना प्रमुख सब्जेक्ट साइंस रखूं, लेकिन मन नहीं माना और उन्होंने आर्ट्स रख लिया। कॉलेज के दिनों में ही मनिंदर कोश से दोस्ती हुई, जिसके घर आना जाना होता रहता था, उनके घर में साहित्य से जुड़ी बातें होती थीं। वहीं से मेरे अंदर भी साहित्य को लेकर एक विशेष मोह पैदा हो गया।

गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर से पंजाबी में एमए करने के बाद यूपीएससी का टेस्ट दिया और पहले ही प्रयास में सफलता हाथ लग गई।

उन्होंने बताया कि लिखने की शुरुआत कविताओं से हुई। 1982 में पहली कविताओं की किताब प्रकाशित हुई, जिसके बाद अब तक कुल 8 किताबें छप चुकी हैं। 3 किताबें साहित्य दर्शन पर लिखी हैं। गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी से ही दशम ग्रंथ को विषय पर पीएचडी भी की।

पिछले साल जब साहित्य अकादमी पुरस्कार में देशभर से तीन पुस्तक का चयन हुआ उनमें से दो पुस्तकें डा. मनमोहन की थीं, जिनमें से एक उनका नावेल (निर्वाण) था और एक कविताओं की पुस्तक थी।

डा. मनमोहन सिंह ने अपने अगले प्रोजेक्ट के बारे में बताते हुए कहा कि वह अपने परिवार पर आधारित एक किताब जल्द ही लिखेंगे।

कार्यक्रम के दूसरे भाग में माधव कौशिक ने दिल्ली की लेखिका गीतांजलि श्री से उनके साहित्य लेखन पर चर्चा की। गीतांजलि का बचपन यूपी राज्य में बीता और यहीं से उन्होंने शिक्षा ग्रहण की।

उनका हिंदी से जुड़ाव काफी रहा। इतिहास में एमए करने के बाद यह दुविधा थी कि लेखनी के लिए किस भाषा को चुना जाए। पहला नावेल जब लिखा तो हिंदी से शुरुआत की, जिसका नाम माई रखा।

गीतांजलि ने बताया कि बेशक यह एक भारतीय कल्चर के अनुसार लिखी गई है, लेकिन मां के प्रति संवेदना सभी में है, इसलिए इस पुस्तक का अंग्रेजी, जर्मन और अन्य भाषा में अनुवाद हो चुका है।
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अगले प्रोजेक्ट के बारे में उन्होंने कहा कि अगली किताब की कहानी एक ऐसी महिला की है, जिसकी उम्र 80 साल है और उसका पति अभी-अभी मरा है। उसको इस उम्र में महसूस होता है की वह आजाद है और उसी तरीके से जीने लगती है, जिससे उसके परिवार में अन्य लोगों को बढ़ी तकलीफ होती है।

कार्यक्रम में दोपहर के सेशन में स्कूली, कालेज और यूनीवर्सिटी में लिखित प्रतियोगिता के विजेताओं को प्रशासक के सलाहकार केके शर्मा ने पुरस्कृत किया।

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