खेतों में हल जोतने वाले पंजाब के किसान सियासत की ओर क्यों अग्रसर हुए हैं। इस बड़े सवाल की कुछ बड़ी वजह भी हैं जिनके कारण किसानों को हल छोड़कर सियासत का झंडा उठाना पड़ा है। सबसे बड़ी वजह यह है कि पंजाब कृषि राज्य है। यहां की आर्थिकी का प्रमुख स्रोत किसानी है। इस कारण से यहां के अधिकतर मुद्दे भी किसानों से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा सूबे की कुल 117 सीटों में 77 सीटों पर किसानों की निर्णायक भूमिका भी उनकी इस दावेदारी को और मजबूत करती है।
2022 के चुनावी मैदान में किसानों के दो प्रमुख राजनीतिक दलों ने सियासत की राह पकड़ी है। प्रमुख रूप से किसान नेता बलबीर राजेवाल के नेतृत्व में 22 किसान संगठन संयुक्त समाज मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ रहे हैं। यहां इनका मजबूत आधार है। इसके अलावा संयुक्त संघर्ष पार्टी बनाकर हरियाणा के किसान नेता गुरनाम चढूनी चुनाव मैदान में हैं।
पंजाब में लगभग 1850 छोटी बड़ी मंडियां हैं। इन मंडियों का प्रतिवर्ष का टर्नओवर 3500-3600 करोड़ है। इसके साथ ही कृषि यंत्रों का भी 3000 करोड़ के लगभग कारोबार होता है। 1000 करोड़ रुपये परिवहन का कारोबार है। सबसे बड़ा सूबे में उवर्रक का लगभग 15000 करोड़ प्रतिवर्ष का कारोबार है। इसके अलावा यहां के आढ़ती भरी प्रतिवर्ष किसानों से करीब 1500 करोड़ रुपये की आय करते हैं।
पंजाब कृषि संपन्न राज्य होने के बाद भी किसानों की आत्महत्याओं की संख्या में कमी नहीं आ रही है। पिछले 2 सालों की यदि हम बात करें तो 471 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। इसके पीछे की बड़ी वजह खेती करने के लिए लिए जाने वाले कर्ज की अदायगी नहीं कर पाने को बताया जा रहा है।
पंजाब को तीन प्रमुख हिस्सो में विभाजित किया जाता है। इसमें सबसे बड़ा क्षेत्र मालवा है। इसके बाद माझा और फिर दोआबा। मालवा में कुल 69 सीटें हैं। इनमें अधिकांश सीटें ग्रामीण हैं। यही वजह है कि यहां किसानों का दबदबा है। इसके अलावा माझा में 25 और दोआबा में 23 सीटें आती हैं। दोआबा में ज्यादातर अनुसूचित जाति वाली सीटें हैं। माझा में सिख बाहुल्य सीटें हैं।
चुनाव में किसानों को हर वर्ग का साथ मिल रहा है। किसानों के साथ ही हर वर्ग से चुनाव में प्रत्याशी बनाया जाएगा। - बलबीर राजेवाल, किसान नेता, संयुक्त समाज मोर्चा