लक्खोवाल के अनुसार सरकार काऊ सेस के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये एकत्र कर रही है लेकिन इस समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। उनकी पंजाब से मांग है कि काऊ सेस से एकत्र होने वाला करोड़ों रुपये उनकी यूनियन को दिए जाए। वह पूरे सूबे में इन जानवरों को संभालने के लिए तैयार हैं। वहीं दिल्ली और यूपी की तर्ज पर पंजाब में भी बूचड़खाने खोलने चाहिए।
सूबे भर में ऐसे पांच बूचड़खाने तो जरूर खुलने चाहिए। इससे सरकार को आमदन तो होगी ही साथ में इस समस्या का स्थायी हल भी निकलेगा। सरकार इस तरफ गौर नहीं कर रही है इसलिए उन्होंने 5 फरवरी तक समस्या के हल के लिए अल्टीमेटम दिया था।
आखिरकार वह वीरवार को बेसहारा जानवरों को लेकर निकले हैं जिन्हें डीसी को सौंपा जाएगा। सात फरवरी को फरीदकोट और 18 फरवरी को जालंधर में यूनियन की तरफ से इसी तरह जानवरों को पकड़कर डीसी को दिया जाएगा। इसके बाद यह मुहिम पूरे प्रदेश में चलाई जाएगी।
हर साल काऊ सेस के नाम पर एकत्र होता है 60 करोड़ रुपये
गोशाला बठिंडा के महामंत्री साधु राम कुसला बताते हैं कि प्रदेश भर में 364 गोशाला हैं। यहां पर विभिन्न संस्थाएं सैकड़ों गोवंश की सेवा कर रही हैं। पंजाब सरकार ने 19 अक्तूबर 2015 को काऊ सेस की शुरुआत की थी। सरकार ने नौ आइटम पर काऊ सेस लगाने की घोषणा की थी। इसमें बिजली, शराब, बीयर, एसी मैरिज पैलेस, नॉन एसी मैरिज पैलेस, तेल टैंकर, चार पहिया वाहन और दोपहिया वाहन शामिल हैं। प्रदेश भर से सरकार को लगभग 60 करोड़ से ज्यादा का काऊ सेस एक साल में एकत्र होता है लेकिन इसमें से बहुत कम हिस्सा गोशाला को मिलता है।
सिर्फ पांच आइटम पर मिलता है काऊ सेस
सरकार ने पूरे प्रदेश में चाहे नौ आइटम पर काऊ सेस लगाने की घोषणा की थी, जमीनी स्तर पर बात करे तो सिर्फ पांच आइटम से ही काऊ सेस मिल रहा है। नगर निगम लुधियाना के अधिकारियों के अनुसार उन्हें हर माह लगभग 30 लाख रुपये काऊ सेस के मिलते हैं। यह काऊ सेस नए वाहन, जन्म और मृत्यु सर्टिफिकेट, नक्शा पास और तेल टैंकर से मिल रहा है। इसके अलावा एक्साइज या फिर बिजली विभाग से काऊ सेस नहीं मिल रहा है।