संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के 32 में से 22 किसान संगठनों द्वारा पंजाब के विधानसभा चुनाव में उतरने की घोषणा ने सूबे में सियासी दलों के वोटों संबंधी समीकरण गड़बड़ा दिए हैं। इस बात का आंकलन भी होने लगा है कि दिल्ली की सीमाओं पर एक साल तक आंदोलन करके लौटी किसान जत्थेबंदियों को वहां अपनी जीत का पंजाब में कितना लाभ मिलेगा।
फिलहाल यह माना जा रहा है कि जत्थेबंदियों का यह फैसला किसानों के मुद्दों को सियासत की भेंट चढ़ा सकता है, क्योंकि तीन कृषि कानून रद्द होने के बाद भी किसानों की कई मांगें अभी लंबित हैं। इनके लिए अब तक गैर राजनीतिक संगठन के रूप में आंदोलन करती रही किसान जत्थेबंदियां अब संयुक्त समाज मोर्चा (एसएसएम) के रूप में नजर आएंगी और आंदोलन भी सियासी रंग ले लेगा।
सियासी शक्ल ले लेगा किसानों का आंदोलन
एसकेएम, जिसकी अगुवाई में पंजाब की 32 किसान जत्थेबंदियों ने की और जिससे देशभर के 400 किसान संगठन जुड़े हैं, का विधानसभा चुनाव के लिए दोफाड़ होना, देश की किसान एकता के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा रहा। दिल्ली की सीमाओं से लौटते हुए एसकेएम ने घोषणा की थी कि लंबित मांगों पर केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की 15 जनवरी, 2022 को समीक्षा की जाएगी और अगर जरूरी समझा गया तो एसकेएम फिर से आंदोलन शुरू करेगा। पंजाब के सियासी गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई है कि एसकेएम के लिए किसानों के हित में फिर आंदोलन शुरू कर पाना आसान नहीं रह जाएगा, क्योंकि किसान जत्थेबंदियां अब एसएसएम के बैनर तले राजनीतिक दल के रूप में नजर आएंगी और किसानों का आंदोलन सियासी शक्ल ले लेगा। ऐसे में केंद्र की सरकार भी किसान आंदोलन को एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में अनसुना करने का प्रयास करेगी।
बढ़ी सियासी दलों की चिंता
पंजाब के विधानसभा चुनाव में इस बार कांग्रेस, शिअद, आप और कैप्टन-भाजपा गठबंधन के रूप में चौतरफा मुकाबला तय माना जा रहा था। अब किसानों के मैदान में आने से चारों सियासी दलों की चिंता बढ़ गई है। भाजपा को छोड़ बाकी सभी दलों की जीत में ग्रामीण वोट अहम भूमिका रखते हैं। भले ही शहरी वोटों को लेकर भाजपा की स्थिति मजबूत मानी जा रही हो, लेकिन पंजाब का बीते चुनाव परिणामों पर नजर दौड़ाई जाए तो सरकार बनाने में शहरी वोटों से ज्यादा ग्रामीण वोटों की महत्वपूर्ण साबित होते हैं। इन दोनों वर्गों के वोटों का लाभ अकाली-भाजपा गठबंधन को लगातार हासिल होता रहा था।
किसान जत्थेबंदियों के सदस्य हैं सभी गांव
पंजाब के ग्रामीण इलाकों में मजहबी सिखों की आबादी ज्यादा है। हालांकि इनके साथ रविदासीय समाज, वाल्मीकि समाज, भगत समाज और सूबे के विभिन्न धार्मिक डेरों को अनुयायियों की भी बड़ी संख्या है। लेकिन इस बार ग्रामीण इलाकों में जातीय समीकरण के इतर एक नई सोच भी काम कर रही है कि सभी खुद को किसान समुदाय मानकर चल रहे हैं और इसी सोच के साथ ग्रामीणों ने एकजुटता के साथ साल भर आंदोलन भी चलाया है। एसएसएम में शामिल किसान जत्थेबंदियों का विभिन्न जिलों के सैकड़ों गांवों में वर्चस्व है और ग्रामीण इन जत्थेबंदियों के सदस्य भी हैं। अगर सभी जत्थेबंदियों ने अपने सदस्य ग्रामीणों के वोट भी हासिल कर लिए तो इस बार विधानसभा चुनाव में सभी पारंपरिक सियासी दल बहुमत से दूर रह जाएंगे। लेकिन यह भी तय है कि अकेले ग्रामीण वोटों के सहारे एसएसएम भी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होगी। तब गठबंधन की नई बिसात बिछना तय है।