चंद्रमा पर जीवन पूरी तरह असंभव है। वहां कोई भी ऐसा तत्व नहीं, जो चंद्रमा पर जीवन की किसी भी संभावना को मजबूत करे। चंद्रमा केवल स्पेस टूरिज्म का केंद्र था और रहेगा।
जबकि दूसरी ओर, मंगल ग्रह पर जीवन के अनुकूल वातावरण तो है, लेकिन उसकी परत ज्यादा पतली है। इसलिए अभी वहां जीवन की संभावनाएं ढूंढी जा रही हैं।
दोनों ग्रहों से जुड़े इन शोध तथ्यों को मंगलवार को इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन (इसरो) के रिटायर्ड सीनियर साइंटिस्ट कृष्ण मुरारी माथुर ने अमर उजाला से साझे किए।
वे अंबाला कैंट के एसडी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में बच्चों से रूबरू हुए। प्राचार्य रमेश बंसल ने उन्हें स्पेस की जानकारी देने के लिए आमंत्रित किया था।
पृथ्वी पर पांच तो चांद पर 30 फुट कूद सकते हैं
माथुर ने बताया कि चंद्रमा पर इसरो की ओर से अब तक जितनी भी रिसर्च की गई है, उसके मुताबिक चंद्रमा पर जीवन कतई संभव नहीं है, क्योंकि चंद्रमा पर सूर्य की किरणें बिल्कुल सीधी पड़ती हैं। सूर्य और चंद्रमा के बीच सूर्य की खतरनाक विकिरण को रोकने के लिए कोई परत नहीं है।
पृथ्वी पर ओजोन परत समेत कई ऐसी परतें है, जो सूर्य की परा बैंगनी समेत अन्य खतरनाक विकिरणों को पृथ्वी पर नहीं आने देती। लेकिन चंद्रमा पर ऐसा नहीं है। इसी वजह से वहां दिन का तापमान बहुत ज्यादा और रात का तापमान बहुत ही कम रहता है। दूसरा, चंद्रमा पर पानी तो है, लेकिन ठोस रूप यानी (बर्फ जैसे रूप में)।
तीसरा- चंद्रमा पर ग्रैविटी (गुरुत्वाकर्षण बल) बहुत कम है। यानी हम यदि पृथ्वी पर पांच फुट ऊंचा कूद सकते हैं तो चंद्रमा पर 30 फुट ऊंचा कूदा जा सकता है। इसी तरह रिसर्च में कई ऐसी खुलासे हुए हैं, जिसने ये साबित किया है कि चंद्रमा को स्पेस टूरिज्म के लिए ही केंद्रित किया जा सकता है।
‘मॉम’ से मिल रहा है ढेरों डॉटा
भारत के मार्स आर्बिटर मिशन (मॉम) के तहत हाल ही में मंगल ग्रह को भेजा मंगल यान काफी डॉटा इसरो सेंटर में भेज रहा है। वरिष्ठ वैज्ञानिक के अनुसार ये सारा डॉटा इलेक्ट्रानिक डिजिटल रूप में मिल रहा है।
इसे रि-प्रोसेस कर फोटो रूप में क न्वर्ट किया जा रहा है। लेकिन अभी इन फोटोग्राफ पर रिसर्च होना बाकी है। इन फोटोग्राफ से इस बात की रिसर्च की जाएगी कि मंगल पर ‘लाइफ स्पोर्टिंग एटमॉसफियर’ कैसा है? जीवन के लिए जरूरी मिथेन, कैल्शियम, कार्बन डाईआक्साइड, आयरन समेत अन्य तत्वों की मात्रा कितनी है?
कक्षा से न भटके मंगलयान, इसके लिए इंतजाम
मंगल ग्रह की जानकारी लेने भारत की ओर से भेजे गया यान कक्षा से भटक न जाए, इसके लिए भी पूरा इंतजाम किया है। इस मंगलयान में ही छोटे-छोटे रॉकेट (थ्रस्टर) लगाए गए हैं। जैसे ही ये मंगलयान किन्हीं कारणों से अपनी कक्षा से भटकता है, तो इन्हीं रॉकेट को फायर करके इस यान पर थोड़ा दबाव बनाया जाएगा, जिससे कि वे फिर से अपनी कक्षा में स्थापित हो सके और अपने तीन से चार साल का कार्यकाल पूरा कर सके।
पानी की क्या संभावनाएं है? इत्यादि कई पहलुओं पर रिसर्च करने के लिए कई वरिष्ठ साइंटिस्ट जुटे हैं। माथुर के अनुसार भारत का यह चंद्रयान 3 से 4 साल तक मंगल की कक्ष में लगातार घूमता रहेगा और ढेरों डॉटा लगातार भेजता रहेगा।