आम तौर पर पंजाब में मालवा, दोआबा और माझा का जिक्र आता है, लेकिन एक इलाका पुआध भी है। इसकी अपनी संस्कृति और भाषा है। पुआध का इलाका पुराना अंबाला जिला है, जिसमें राजपुरा, नालागढ़, बद्दी, कालका, पिंजौर, आनंदपुर साहिब, रोपड़ और हिमाचल के ऊना के साथ लगते इलाके शामिल हैं।
इन इलाकों की लुप्तप्राय संस्कृति को मलवई-पुआधी गिद्दे में संजोया है मालवा कल्चरल एंड वेलफेयर सोसाइटी के कलाकारों ने। इनके द्वारा तैयार किए गए गिद्दे में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल सरहद की संस्कृतिक झलक देखने को मिल रही है।
शीतला माता को मानते हैं पुआध के लोग
पुआध के एरिया में साझी जगह पर जहां पर पूजा पाठ होता था उसे खेड़ा कहते हैं। इन इलाकों के गांव में शीतला माता के मंदिर हैं। यहां के लोग शीतला माता को मानते हैं। इस इलाके में का शब्द का अधिक प्रयोग होता है। इसमें गुरु का लंगर कहा जाता है, जबकि पंजाबी में दा का प्रयोग होता है जबकि हिंदी और पुआध में का प्रयोग होता है। यहां पर भाषा थोड़ा हरियाणवी लहजे में बोली जाती है।
बीते दिनों सेक्टर 16 के पंजाब कला भवन में मेला मालवे का आयोजन हुआ। इसमें मलवई और पुआधी गिददे में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश की सरहदी संस्कृति की झलक देखने को मिली। पंजाब और हरियाणा की सरहद में खो चुकी पुआधी संस्कृति को बचाने की यह बड़ी कवायद है। पुआधी विरासत को मालवा कल्चरल एंड वेलफेयर सोसाइटी के कलाकार बचाने में जुटे हैं। पंजाब कला भवन में मालवा कल्चरल एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी चंडीगढ़ और मोहाली की ओर से मेला मालवे में बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत की।
संस्था के प्रधान प्रीतम सिंह रुपल ने बताया कि हमारे लोग मालवे के हैं। यहां पर 30-40 वर्षों से रह रहे हैं। चंडीगढ़ में दूर दूर से लोग आकर अपनी संस्कृति तो बढ़ा लिया। पुआध पीछे रह गया। नए बच्चे इस पर काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मेले का मुख्य आकर्षण रवायती ढाडी, कवीसर, लंबी गीत, खुली गायकी का अखाड़ा, बेगोनार यह बोलियों के आधार पर ओपेरा का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में मलवई गिददा और पुआदी गिददा ने धूम मचाई।
उन्होंने कहा कि कार्यक्रम करने के लिए पूरे तौर पर रिसर्च वर्क होता है। काफी होमवर्म के बाद हम सभी कार्यक्रम करते हैं। एक एक शब्दों पर पूरी तरह से नजर होती है। कार्यक्रम के लिए बड़ी कठिन रिहर्सल करनी पड़ती है। प्रीतम सिंह रुपल ने बताया कि इस कार्यक्रम में एक बड़ी गीत, शादियों में गाए जानेवाले, सुहाग और घोड़ियां गीतों की प्रस्तुति शानदार होती है। इसमें कोई कहानी को गीतों और बोलियों के माध्यम से दर्शकों के बीच ले जाते हैं। उसी पर मलवई और पुआधी गिददा होती है। इसमें खास नृत्य नाटिका भी होती है। इसके माध्यम से किसी की कहानी बताई जाती है। इस बार के आयोजन में बेगो नार की कहानी बताई गई थी।
खाने के स्टाल में भी इस रीजन की लजीज व्यंजन रखे गए थे। इनमें खाने पीने की चीजों में बाजरे और मक्की की रोटी, सरसों का साग, बाजरे की खिचड़ी, रिडकणे की लस्सी, हरी लहसुन की चटनी, गलगल और आदी का अचार, गुड़ खोपे वाले मीठे चावल आकर्षण रहे। इस दौरान लोक दस्तकारी बाग फुलकारी और पंजाबी पहनावे की प्रदर्शनी भी लगी थी।