चंडीगढ़ के सार्वजनिक शौचालय पर काम करने वाले कर्मचारी डीसी रेट की मांग को लेकर पिछले करीब दो महीने से नगर निगम के बाहर धरने पर बैठे हैं। पहली बार ऐसा हो रहा है कि नगर निगम भी इन कर्मचारियों को डीसी रेट देना चाह रहा है लेकिन पार्षद ही रोड़ा बन गए है। दो बार निगम की तरफ से एजेंडा सदन में लाया गया लेकिन पार्षदों ने दोनों बार आपत्ति लगा दी और एजेंडा पास नहीं हुआ।
शहर में सार्वजनिक शौचालयों के नाम पर कमाई का खेल कोई नया नहीं है। कई सार्वजनिक शौचालय को किसी संस्था के नाम से नेता ही चला रहे हैं। कई नेताओं ने अपने रिश्तेदार, परिवार के सदस्यों के नाम पर शौचालय लिए हुए हैं, क्योंकि इसमें कमाई भी खूब है। निगम एक शौचालय को चलाने के लिए हर महीने 30 हजार रुपये देता है। कर्मचारियों को 7 हजार से 9 हजार रुपये ही दिए जाते हैं। दो-तीन हजार रुपये साप-सफाई के सामान पर खर्च होते हैं। बाकी रुपये सीधे तौर पर बचते हैं। कई संस्थाओं के पास तीन से लेकर 10 तक सार्वजनिक शौचालय हैं। ऐसे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि हर महीने शौचालय के नाम पर कैसे पैसे कूटे जा रहे हैं। ऐसे में कई नेताओं की चिंता बढ़ गई है कि अगर कर्मचारियों पर डीसी रेट लागू होता है तो उन्हें पैसे बचने बंद हो जाएंगे। बता दें कि शौचालय इस्तेमाल करने पर लोग जो पैसे चुकाते हैं, वो भी संस्था ही रखती है।
कर्मचारियों को डीसी रेट देने के लिए निगम की सदन की बैठक में दो बार एजेंडा आ चुका है। निगम ने योजना बनाई है कि संस्थाओं को 30 हजार की जगह हर महीने 52,217 रुपये दिए जाएंगे लेकिन दो कर्मचारी रखने होंगे और उन्हें डीसी रेट देना होगा। पीएफ के साथ कर्मी को हफ्ते में एक छुट्टी भी देनी होगी। उन्हें पूरा अकाउंट रखना होगा, निगम कभी भी जांच कर सकता है। अगस्त माह की बैठक में ज्यादा चर्चा नहीं हुई है और कमेटी बनाने की बात कहकर एजेंडे को अगली बैठक में लाने के लिए कह दिया गया। अगली बैठक 26 सितंबर को हुई तो उसमें काफी चर्चा हुई लेकिन फिर कमेटी बनाने की बात हुई और एजेंडे को टाल दिया गया। दोनों बार एजेंडा पास नहीं हुआ।
दो कर्मचारियों और एक रिलीवर का डीसी रेट ही 52 हजार रुपये हो जाएगा तो साबुन और बाकी सामान कहां से आएगा। कोई संस्था घाटे में क्यों काम करेगी।
कई शौचालयों पर इसी रेट में ठेकेदार काम कर रहे हैं और डीसी रेट भी दे रहे हैं। अगर आरडब्ल्यूए-एमडब्ल्यूए कर्मचारियों को डीसी रेट नहीं देंगे तो तो निगम पर सवाल उठेगा।
- समान काम के लिए समान वेतन नहीं। किसी को 6 हजार को किसी को 8 हजार रुपये
19 हजार से सैलरी घटकर हुई 8 हजार
मैं जिस शौचालय पर काम करता था, उसे पहले कंपनी चलाती थी तो मुझे 19 हजार रुपये और पीएफ भी मिलता था। अब एक संस्था ने काम ले लिया है। वो मुझे सिर्फ 8 हजार रुपये दे रहे हैं। मेरे तीन बच्चे हैं। 8 हजार में कैसे गुजारा चलाऊं। - राहुल, कर्मचारी
7500 रुपये मिलते हैं, वो भी तीन महीने से नहीं मिले
मैं सेक्टर-33ए में एक शौचालय पर काम करता हूं। मुझे सिर्फ 7500 रुपये सैलरी मिलती है। वो भी तीन महीने से नहीं मिली है। महंगाई के इस दौर में क्या 7500 रुपये में कोई घर चला सकता है। हमें डीसी रेट मिलना चाहिए। कर्मचारियों का बहुत शोषण हो रहा है। - सुनील, कर्मचारी
आवाज उठाने पर काम से निकाल दिया जाता है
मुझे 9000 रुपये मिलते हैं। ये पैसे भी हमेशा लेट मिलते हैं। छुट्टी कोई नहीं है। शौचालय पर काम करने वाले कर्मचारियों का बहुत बुरी तरह से शोषण हो रहा है। आवाज उठाने पर काम से निकाल दिया जाता है। - संदीप, कर्मचारी
पांच महीने से नहीं मिला वेतन
मनीमाजरा में एक शौचालय पर काम करता हूं। पैसे बहुत कम मिलते हैं। मुझे पांच महीने से वेतन नहीं मिला है। कैसे गुजारा चलाएं। कोई सुनने वाला नहीं है। हमें डीसी रेट मिलेगा तो ही थोड़ी राहत मिलेगी। - देशराज, कर्मचारी
गहनता से विचार के लिए बनाई कमेटी
शौचालयों पर काम करने वाले कर्मचारियों को डीसी रेट मिलेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है। सदन में एजेंडा आया था। चर्चा के दौरान कई बातें उठी हैं, जिनपर गहनता से विचार करने के लिए कमेटी बनाई गई है। - कुलदीप कुमार, मेयर
कर्मचारियों को मिलना चाहिए डीसी रेट
कर्मचारियों को डीसी रेट मिलना चाहिए। भाजपा का रुख स्पष्ट है। हमने सदन में भी इस पर विस्तार से चर्चा की है। कर्मचारियों को डीसी रेट की सभी सुविधाएं और नौकरी की सुरक्षा भी मिलनी चाहिए ताकि ठेका बदलने के बाद उन्हें परेशान न किया जाए। - कंवरजीत राणा, नेता प्रतिपक्ष