इंडिया गठबंधन की शुरुआत से ही पंजाब में इसके सिरे चढ़ने की संभावना कम ही लग रही थी, लेकिन इसके बावजूद दोनों ही पार्टियों का हाईकमान इसे अमल में लाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा था। अंत में दोनों ही पार्टियों के नेताओं की गठबंधन न करने की बात शीर्ष नेतृत्व को माननी पड़ी।
आप व कांग्रेस दोनों ने ही पंजाब में अलग-अलग चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। इससे चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। लोकसभा की 13 सीटों को लेकर भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल की आगामी रणनीति पर भी पानी फिर गया है।
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आप व कांग्रेस के प्रदेश में रास्ते अलग होने का भाजपा और शिअद को नुकसान हो सकता है। गठबंधन करने से आप व कांग्रेस को अपना कैडर वोट जाने का खतरा बना हुआ था और उसे ही भाजपा व शिअद अपना फायदा मान कर चल रहे थे। दोनों के अलग चुनाव लड़ने से अब यह खतरा टल गया है।
इंडिया गठबंधन की शुरुआत से ही पंजाब में इसके सिरे चढ़ने की संभावना कम ही लग रही थी, लेकिन इसके बावजूद दोनों ही पार्टियों का हाईकमान इसे अमल में लाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा था। अंत में दोनों ही पार्टियों के नेताओं की गठबंधन न करने की बात शीर्ष नेतृत्व को माननी पड़ी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में आप ने 117 में से 92 सीटों पर जीत दर्ज करने के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। कांग्रेस का वोट बैंक जो आम तौर पर प्रदेश में 40 प्रतिशत के करीब रह गया था, वो गिरकर तकरीबन 17 प्रतिशत तक आ गया था। अगर गठबंधन होता तो लोकसभा चुनाव में ये वोट बैंक आगे भी कांग्रेस से किनारा कर सकता था। भाजपा या फिर शिअद को इसका अधिक फायदा होना था। साथ ही गठबंधन से आप को सत्ता में होने का भी फायदा मिलना था। कांग्रेस को भी ये डर था कि अगर ये वोट बैंक गठबंधन पर आप को चला गया तो शायद उनके हक में वापस न आए।
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नेताओं की नाराजगी का भी था डर
आप व कांग्रेस को कैडर वोट के अलावा अपने वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी का डर भी बना हुआ था। अगर गठबंधन होता तो दोनों ही पार्टियों के प्रमुख नेता भाजपा या अकाली दल का रुख करने के साथ ही अन्य विकल्प तलाशने शुरू कर देते। गठबंधन का विरोध कर रही नेताओं से पहले ही भाजपा और शिअद संपर्क साधने लग गए थे। हालांकि, वरिष्ठ नेता शीर्ष नेतृत्व के अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे थे, जो उनके हक में आया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और आप प्रदेश प्रधान भगवंत मान भी सार्वजनिक तौर पर प्रदेश में दोनों पार्टियों के गठबंधन के विरोध में रहे। निचले स्तर के नेता व कार्यकर्ताओं को पहले ही गठबंधन की चर्चा गले नहीं उतर रही थी।
अब सिर्फ इस बात से उम्मीद लगाए बैठी भाजपा और शिअद
प्रदेश में आप व कांग्रेस का गठबंधन सिरे न चढ़ने के बाद भाजपा व अकाली को सिर्फ इस बात की उम्मीद है कि जो लोग प्रदेश में आप व कांग्रेस के गठबंधन के समर्थन में थे, वो शायद आगामी लोकसभा चुनाव में उनके पक्ष में जा जाएं। इसके अलावा अन्य राज्यों में गठबंधन व पंजाब में अलग चुनाव लड़ने का फैसला भी आप व कांग्रेस कुछ नुकसान कर सकता है। भाजपा व शिअद के प्रचार का फोकस सिर्फ इस बात पर है कि ऐसा दोगलापन करके प्रदेश के लोगों के साथ धोखा किया जा रहा है।