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मसोल का दर्द: गांव में नहीं आता सिग्नल, धूप में पहाड़ पर जाकर पढ़ने को मजबूर हैं छात्र

Sat, 15 May 2021 12:57 PM IST
निवेदिता वर्मा वेद शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, नयागांव (पंजाब)

सार

मसोल के लोगों का कहना है कि पता नहीं उनके गांव की तकदीर कब बदलेगी। सरकार को इस दिशा में उचित कार्रवाई करने के लिए पहल करनी होगी।
 
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मसोल का स्कूल। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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दो राज्यों की राजधानी चंडीगढ़ से मात्र 15 किलोमीटर दूर स्थित पंजाब के गांव मसोल में सिर्फ 5वीं तक का स्कूल है। इसी कारण से यहां के ज्यादातर बच्चे आगे की पढ़ाई छोड़ देते हैं। वहीं, कोरोना काल में बच्चों और उनके परिजनों की दिक्कत और ज्यादा बढ़ गई है। क्योंकि गांव में मोबाइल के सिग्नल नहीं आते। इसका खामियाजा ऑनलाइन पढ़ने वाले बच्चों से लेकर आम लोगों को रोजाना हो रहा है। पहाड़ चढ़ने पर मोबाइल में सिग्नल आता है तो बच्चों को तपती धूप में मजबूरीवश अपनी ऑनलाइन क्लास लगवाने के लिए पहाड़ों पर जाना पड़ता है। वहां पर पेड़ या अस्थायी झोपड़ी के नीचे पढ़ाई करनी पड़ रही है। 

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मसोल गांव में सिर्फ 5वीं तक ही स्कूल है। इसके बाद बच्चों को 10 से 12 किलोमीटर दूर पंजाब के नयागांव या हरियाणा की हद में पड़ते गांव बसौल में जाकर पढ़ाई करनी पड़ती है। इसके लिए बच्चों को पैदल आने-जाने में तकरीबन 3-4 घंटे लग जाते हैं। कुछ ग्रामीणों ने बच्चों को स्कूल छोड़ने और लाने के लिए ऊंट रखे हुए हैं। ग्रामीण बच्चों को ऊंट पर बैठाकर स्कूल छोड़कर आते हैं और फिर वापस लेकर आते हैं। 

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स्कूल है दूर इसलिए बीच में छोड़ दी पढ़ाई

पूजा रानी करीब दो साल पहले आगे की पढ़ाई छोड़ चुकी है। उसने बताया कि वह पढ़लिख कर अपने गांव की भलाई के लिए कुछ करना चाहती थी। लेकिन परिजनों ने इतनी दूर जाने की अनुमति नहीं दी। इस कारण उसको पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।

स्कूल आने-जाने में लगते हैं करीब तीन-चार घंटे
हैप्पी सिंह 12वीं कक्षा में है और वह गांव नाडा में पढ़ता है। उसने कहा कि उन्हें रोजाना डेढ़ से दो घंटे सुबह स्कूल जाने में लगते हैं और इतना ही समय आने में लगता है। अगर गांव में आने-जाने का कोई साधन हो तो वह इतना समय अपनी पढ़ाई में लगा सकते थे।

पढ़ाई न करने से बच्चों के भविष्य पर पड़ता है असर
गांव की पंच भोला कौर ने कहा कि गांव में सिर्फ पांचवी तक स्कूल होने के कारण इसके बाद बच्चों को बाहर दूसरे गांव में पढ़ाई के लिए जाना पड़ता है। कोई साधन न होने के कारण काफी बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं जिस कारण गांव में काफी बच्चे बिना पढ़ाई के रह जाते हैं और फिर उन्हें अपना जीवन यापन करने के लिए सिर्फ मजदूरी ही करनी पड़ती है।

नेटवर्क की दिक्कत से बच्चों को होम वर्क भेजने में होती है परेशानी
प्राथमिक स्कूल के अध्यापक नरेश कुमार ने कहा कि स्कूल में कुल 64 विद्यार्थी हैं। अभी कोरोना के कारण हम बच्चों को स्कूल नहीं बुला रहे हैं। बच्चों को सिर्फ फोन पर ही काम भेजते हैं। यहां पर नेटवर्क की दिक्कत होने के कारण हमें भी बच्चों को होमवर्क भेजने में बहुत परेशानी होती है।
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