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नशे के काले कारोबार का काला सच, पार्ट-2

Mon, 09 Jun 2014 11:21 AM IST
अखिल तलवार/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पंजाब काफी समय से अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आने वाले नशीले पदार्थों का ट्रांजिट प्वाइंट रहा है। लेकिन समय के साथ नशे के कारोबारियों को करोड़ों कमाने का फॉर्मूला हाथ लगा, वह था सिंथेटिक ड्रग्स एम्फेटामाइन, जिसे आइस या पार्टी ड्रग भी कहते हैं। इसकी देश-विदेश में अधिक मांग है और कीमत भी बहुत ज्यादा है।
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बाजार में उपलब्ध केमिकल की प्रोसेसिंग करके सिंथेटिक ड्रग्स तैयार करने का फॉर्मूला मिलते ही नशा कारोबारी इसमें कूद पड़े और पंजाब सिंथेटिक ड्रग्स की तस्करी का हब बन गया। यहां से तैयार ड्रग्स नए रूट के जरिए पश्चिमी देशों में भेजा जाने लगा।

2009 में आई ‌थी आइस

पंजाब में आइस ने 2009 में दस्तक दी। काउंटर इंटेलिजेंस विंग ने दो अलग-अलग मामलों में चार किलो और 17 किलो आइस बरामद की थी। 17 किलो आइस बरनाला के कारोबारी से मिली। बाद में पुलिस ने उसकी हिमाचल के बद्दी स्थित फैक्ट्री में छापा मारा था।

2009 में ही नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ऑफ इंडिया ने सिंथेटिक ड्रग्स कारोबार के किंग जगदीश भोला को मुंबई में 25 किलो सिंथेटिक ड्रग्स के साथ गिरफ्तार किया था। इसके बाद एक और ड्रग किंग राजा कंदोला के समराला स्थित फार्म में चल रही सिंथेटिक ड्रग्स की फैक्ट्री पर पुलिस ने छापा मारा था।

बहुत गहरी हैं नशे की कारोबार की जड़ें

इस कारोबार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा पुलिस को सिंथेटिक ड्रग्स कारोबार के किंग जगदीश भोला की पिछले साल हुई गिरफ्तारी के बाद चला। अर्जुन अवार्डी भोला पंजाब पुलिस में डीएसपी रह चुका है।

इस केस की जांच के दौरान पुलिस ने 935 किलो एफेड्रिन व स्यूडोफेड्रिन और 13 किलो तैयार पार्टी ड्रग बरामद हुई, जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक हजार करोड़ रुपये थी। पुलिस जांच में सामने आया है कि भोला रैकेट के जरिए 2009 से अब तक तीन सौ किलो सिंथेटिक ड्रग्स यूके, कनाडा, नीदरलैंड आदि देशों में भेज चुका है।

पंजाब में सिंथेटिक ड्रग्स के अब तक दो रैकेट सामने आ चुके हैं। जिसमें एक राजा कंदोला का और दूसरा जगदीश भोला था। दोनों ही विदेश में रह चुके हैं। कंदोला की फैक्ट्री पर छापे के दौरान पुलिस पचास किलो एफेड्रिन व मैथाम्फेटामाइन बरामद किया था। कंदोला गैंग कनाडा और न्यूजीलैंड में सक्रिय था।

ऐसे करते थे ड्रग्स का इंतजाम

दवाइयां बनाने के लिए एफेड्रिन व स्यूडोफेड्रिन जैसे केमिकल इस्तेमाल किए जाते हैं। इनकी कीमत प्रति किलो कुछ लाख रुपये है और तैयार सिंथेटिक ड्रग्स की कीमत करोड़ों रुपये प्रति किलो होती है। ड्रग्स के कारोबारी दवा कंपनी मालिकों से सांठ-गांठ कर ये केमिकल हासिल कर लेते थे। फिर इनसे केमिकल प्रोसेसिंग के जरिए सिंथेटिक ड्रग्स तैयार की जाती थी।

भोला रैकेट ने बद्दी, मेरठ, फरीदाबाद समेत कई जगह की फार्मा कंपनियों से केमिकल हासिल किया था। बद्दी और अन्य जगहों की फार्मा इकाइयों में आइस तैयार करने के बाद इसकी खास पैकिंग की जाती थी, ताकि एयरपोर्ट आदि पर स्कैनिंग में इसका पता न चले। भोला रैकेट वियतनाम और चीन के एक्सपर्ट से पैकिंग कराता था।

नतीजा यह हुआ कि कभी भी एयरपोर्ट आदि पर ड्रग्स नहीं पकड़ी गईं। पैकिंग से पहले खरीददार के लोग ड्रग्स की क्वालिटी चेक करते थे। उसके बाद एयर कारगो या मानव कोरियर के जरिए ड्रग्स विदेश भेजा जाता था। पुलिस जांच में सामने आया है कि फुटवियर हील, पिक्चर फ्रेम, किताबों, कंटेनरों, फूड प्रोडेक्ट बॉक्स में छिपाकर ड्रग्स कनाडा, यूके, नीदरलैंड ले जाया गया।
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गोल्डन ट्राइएंगल बना नया रूट

जगदीश भोला केस की जांच में कुछ समानांतर सिंथेटिक ड्रग्स नेटवर्क का खुलासा हुआ। मुंबई पुलिस के ज्वाइंट ऑपरेशन में राजस्थान निवासी एनआरआई दविंदर सिंह देव को गिरफ्तार किया गया, जो एक अन्य रैकेट का मास्टरमाइंड था। इससे पचास करोड़ का स्यूडोफेड्रिन बरामद किया गया था।

देव की गिरफ्तारी के बाद पता चला कि वह तीन साल से सिंथेटिक ड्रग्स कनाडा और अन्य देशों में भेज रहा था। उससे पूछताछ के बाद एक म्यांमार नागरिक ह्रांग तिन खारा समेत पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया। तब पता चला कि यह रैकेट नए रूट गोल्डन ट्राइएंगल के जरिए म्यांमार-लाओस-थाइलैंड होते हुए उत्तरी अमेरिका ड्रग्स भेजता था।
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