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Chandigarh News: साथ जिए सपने, अब अंतिम सफर पर निकले दोनों दोस्त

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चंडीगढ़। इंडस्ट्रियल एरिया फेज-2 स्थित प्लॉट नंबर-28 पर मरम्मत के दौरान 54 साल पुरानी दो मंजिला इमारत ढहने से जान गंवाने वाले उद्यमी साझेदार तरुण जैन और तरुण कौशिक का रविवार को जीएमसीएच-32 में पोस्टमार्टम किया गया। पोस्टमार्टम के बाद दोनों के शव परिजनों को सौंप दिए गए। सुबह करीब 11 बजे तरुण जैन का शव अंतिम संस्कार के लिए उनके पैतृक शहर मेरठ (उत्तर प्रदेश) रवाना किया गया। वहीं, दोपहर करीब एक बजे तरुण कौशिक का शव सोलन (हिमाचल प्रदेश) भेजा गया जहां उनका अंतिम संस्कार पैतृक गांव में होगा।
हादसे ने दो परिवारों की खुशियां पलभर में छीन लीं। तरुण जैन अपने पीछे पत्नी और 10 वर्षीय बेटे को छोड़ गए हैं जबकि तरुण कौशिक की पत्नी और इकलौती बेटी के सिर से हमेशा के लिए पति और पिता का साया उठ गया। दोनों परिवार गहरे सदमे में हैं और अपनों को अंतिम विदाई देने के लिए अपने-अपने पैतृक घर पहुंच गए।
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परिजनों ने बताया कि दोनों तरुण गहरे मित्र थे और पिछले चार-पांच दिनों से चंडीगढ़ में बाइक सर्विस सेंटर शुरू करने की तैयारी कर रहे थे। दोनों एक निजी होटल में ठहरे हुए थे और परिवार के साथ रहने के लिए शहर में किराये का मकान भी तलाश रहे थे। उनकी इच्छा थी कि दोनों परिवार एक ही जगह रहें, लेकिन हादसे ने उनके सभी सपनों को अधूरा छोड़ दिया।

खबर-2 (ह्यूमन एंगल)
मम्मा आप तो कह रहे थे कि पापा की तबियत खराब है... ये फिर सफेद चादर में कवर क्यों हैं
जीएमसीएच-32 की मोर्चरी के बाहर तरुण कौशिक की इकलौती नन्हीं बेटी की बात सुन हर आंख हुई नम, मां के पास नहीं था कोई जवाब
संवाद न्यूज एजेंसी
चंडीगढ़। जीएमसीएच-32 की मोर्चरी के बाहर रविवार को ऐसा दृश्य था जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं। तरुण कौशिक की इकलौती नन्हीं बेटी अपनी मां का हाथ पकड़कर पिता को घर ले जाने आई थी। उसे यही बताया गया था कि पापा की तबीयत खराब है, लेकिन जब उसने सफेद चादर में लिपटे पिता को देखा तो मासूमियत से मां का हाथ पकड़कर पूछा, ’मम्मा... आप तो कह रहे थे कि पापा बीमार हैं, फिर ये सफेद चादर में क्यों हैं।’
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यह सवाल सुनकर मां खुद को संभाल नहीं सकीं। उन्होंने बेटी को सीने से लगा लिया और फूट-फूटकर रो पड़ीं। मोर्चरी के बाहर मौजूद परिजन और अन्य लोग भी इस दृश्य को देखकर भावुक हो उठे। वहां मौजूद किसी भी व्यक्ति के पास उस मासूम के सवाल का जवाब नहीं था। कुछ देर बाद कागजी औपचारिकताएं पूरी हुईं। शव एम्बुलेंस में रखा गया और मां-बेटी उसी वाहन से सोलन के लिए रवाना हो गईं। यह सफर सिर्फ एक शहर से दूसरे शहर का नहीं था बल्कि एक ऐसी जिंदगी की शुरुआत थी, जिसमें उस मासूम के सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ चुका था।
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