जिन मां-बाप ने अपनी छांव तले बच्चों को जीना सिखाया, अपने पैरों पर खड़ा किया, वहीं बच्चे अब सहारा बनने की बजाय उन्हें 'घाव' दे रहे हैं। यही वजह है कि शहर में 443 मामलों की सुनवाई सीनियर सिटीजंस ट्रिब्यूनल में चल रही है। इनमें बच्चों के द्वारा अपने माता-पिता के साथ धोखाधड़ी से प्रापर्टी अपने नाम कराने के अलावा विदेश ले जाकर उनके साथ नौकरों जैसा व्यवहार करने के मामले शामिल हैं। सीनियर सिटीजंस ट्रिब्यूनल में एडीसी सचिन राणा की देखरेख में इन मामलों की सुनवाई की जा रही है।
ट्रिब्यूनल से मिली जानकारी के अनुसार, वर्ष 2018 तक ट्रिब्यूनल में ऐसे 335 मामले थे, जिन पर सुनवाई पूरी नहीं हो पाई थी। वहीं 2019 में 108 और नए मामले आ गए, जिससे ऐसे विवादों की संख्या बढ़कर 443 हो गई। ट्रिब्यूनल ने गंभीर मामलों पर सुनवाई शुरू की और साल के अंत तक 246 मामलों में फैसला सुना दिया, जिससे अपनों से चोट खाए बुजुर्गों को उनका हक मिल पाया। अब बचे हुए 192 मामलों पर 2020 में सुनवाई होगी और अपनों से मिल रहे घाव से बुजुर्गों को निजात मिल पाएगी।
एससीए के सेक्शन 23 के तहत होगी कार्रवाई
यदि मां बाप ने अपने जिंदा रहते हुए बच्चों के नाम प्रापर्टी कर दी है और उसके बाद बच्चों के द्वारा उनका ख्याल नहीं रखा जाता है तो शिकायत पर ऐसे मामलों में सीनियर सिटीजंस एक्ट के सेक्शन 23 के तहत कार्रवाई की जाएगी। ट्रिब्यूनल इस सेक्शन के सहारे मां-बाप द्वारा बच्चों के नाम की गई प्रापर्टी का मालिकाना हक वापस ले सकता है और बुजुर्गों का हक दिला सकता है।