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दीवाली स्पेशलः मिट्टी के दीये की दास्तां, 90 दिन की मेहनत, कमाई मामूली

Tue, 18 Oct 2016 09:25 AM IST
नीरज कुमार/अमर उजाला, चंडीगढ़
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मिट्टी का दीया
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मिट्टी के दीया बनने की कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही दर्दभरी है इसे बनाने वालों की दास्तां। 90 दिन की मेहनत लगती है और कमाई मामूली सी। मिट्टी से बना दीया सिर्फ दीपावली पर रोशनी का प्रतीक ही नहीं है, इसका एक अर्थशास्त्र भी है।
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कई घरों की रोजीरोटी इसकी लौ की चमक पर टिकी है। हालांकि डेढ़ महीने की मेहनत के बाद भी प्रति मजदूर 4000 हजार रुपये भी हाथ नहीं आते। यानी नब्बे रुपये की दिहाड़ी भी नहीं बनती। चंडीगढ़ के सेक्टर-25 की कालोनी में कुम्हारों के 50 परिवार मिट्टी से दीये और अन्य चीजें बनाते हैं।

चलते चाक पर हाथों के हुनर से ये मिट्टी के लोंदे से कई तरह के दीये, करवा, झकरी, गुल्लक और घड़े को मनचाहा आकार देते हैं। इन परिवारों को दिवाली से काफी उम्मीद रहती है। वैसे करवाचौथ और अहोई अष्टमी पर भी मिट्टी के बर्तनों की मांग होती है।
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यह है दीये का अर्थशास्त्र

मिट्टी का दीया
सेक्टर-25 निवासी कमलेश के अनुसार दो सौ फुट मिट्टी से साठ हजार दीये बनते हैं। इतनी मिट्टी की कीमत साढ़े तीन हजार रुपये है। बनने के बाद ये दीये 350 रुपये से 400 रुपये प्रति हजार तक बिकते हैं। पूरे परिवार की मेहनत के बाद कुल मिलाकर 21 से 24 रुपये तक मिलते हैं।

श्रम का हिसाब
दीये बनाने में इस सेक्टर की राम प्यारी का परिवार भी जुटा है। उनके अनुसार इसके लिए डेढ़ महीने की तैयारी और मेहनत के बाद दीये बनते हैं। दो सौ फुट मिट्टी (एक छोटा ट्रक) से दीये बनाने के लिए चार सदस्यों का पूरा परिवार इसमें लगता है।

मिट्टी खरीदने के बाद उसे तैयार करने में 15 से 20 दिन लगते हैं। सबसे पहले मिट्टी को छानना होता है। फिर इसे भिगोया जाता है। इसके लिए अलग टब काम में लाया जाता है। फिर इस मिट्टी के लौंदे बनाकर चाक से दीये और मिट्टी के बर्तन बनाते हैं।

चार लोगों को परिवार डेढ़ महीने मेहनत कर 21 हजार रुपये बमुश्किल पाता है। इसमें से लागत निकाल कर प्रति सदस्य मेहनताना चार हजार रुपये भी नहीं पड़ता।
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दीये के कारोबार में कई दिक्कतें

मिट्टी का दीया
दीये के इस कारोबार के रास्ते में चीनी लड़ियां ही नहीं और भी कई दिक्कते हैं। दीये और मिट्टी के बर्तन बनाते वक्त अगर अचानक बारिश आ जाती है तो सारी मेहनत और माल बेकार हो जाता है। इससे काफी नुकसान होता है।

कई बार कुत्ते और आवारा पशु भी सूखने के लिए रखे कच्चे दीयों को तोड़ जाते हैं। इतना ही नहीं जब दीयों और मिट्टी के बर्तनों को पकने के लिए भट्टी लगाई जाती है तो इससे धुआं उठने पर लोग फायर ब्रिगेड को सूचना दे देते हैं।

फायर ब्रिगेड के कर्मचारी पानी की बौछार कर आग बुझाकर चले जाते हैं। इससे काफी नुकसान होता है और कुछ हाथ नहीं आता। भट्टी तीन दिन तक जलती रहे तब जाकर बर्तन ठीक से पकते हैं।
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