दीपावली पर लाखों घरों में जिन हाथों से बना दीया रोशन होता है वह हाथ रोशनी को तरस रहे हैं। पचास साल गुजर गए पर मिट्टी से सने हाथों का दर्द कोई समझ नहीं सका। दीपावली आती है तो तीन माह पहले ही इन कुम्हारों के चेहरे पर छोटी सी मुस्कान खिलती है पर दिवाली वाले दिन ही यह मुस्कान जुदा हो जाती है। कारण है कि दीपावली ही ऐसा त्योहार है जिसमें इनकी आमदनी तीन माह में अपनी अधिकतम सीमा तक पहुंचती है और उसके बाद रह जाती है सिर्फ छुटपुट कमाई, जिससे परिवार तक पालना मुश्किल होता है।
पचास साल से करते हैं काम, न छत न दाम
मलोया में रहने वाले जोगिंदर कुमार की मां बिमला बताती हैं कि उनके पति ने चंडीगढ़ में पचास साल पहले काम करना शुरू किया था। उसके बाद पूरे परिवार ने मिट्टी के बर्तन, दीये, गमले और गुल्लक बनाना शुरू किया। पहले काम खूब चलता था। साल में 10 माह बिक्री होती रहती थी। पिछले पांच साल में सब कुछ बदल गया। कुम्हारों का काम सिमट सा गया। उनके परिवार में सात सदस्य हैं, जिनका पालन पोषण इसी के माध्यम से होता है। लेकिन कमाई की बात करें तो साल में दीपावली की त्योहार आता है और
इसी तीन माह में पच्चीस हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है। जोगिंदर कुमार ने बताया कि पच्चीस हजार रुपये में तो अब कुछ भी नहीं होता है। दीया तैयार करने के लिए मिट्टी, पोथी, लकड़ी का बुरादा सब कुछ महंगा हो चुका है। ऐसे में दीपावली के दौरान दीये बिक गए तो ठीक वरना बाकी बेकार चले जाते हैं। दीपावली के बाद ज्यादातर कुम्हार दिहाड़ी में लग जाते हैं, जिससे किसी तरह से गुजारा होता है। इसी तरह राजू बताते हैं कि उन लोगों को सरकारी मदद भी नहीं मिलती है।
पांच सदस्यों का पालन करना भी मुश्किल
दीया तैयार करने वाली रुक्मणी ने बताया कि उनके घर में पांच सदस्य हैं। घर का सारा खर्च मिट्टी के दीये, बर्तन, मटके और गुल्लक तैयार करके ही चलता है। इसके अतिरिक्त कोई काम नहीं है। कई बार ऐसा होता है कि घर में खाने तक के लिए नहीं होता है। दीपावली आती है तो खुशी इस बात की होती है कि उनके दीये बहुतायत में खरीदे जाएंगे। इसमें भी अब मिट्टी बाहर से मंगवाई जाती है और दीया तैयार करने के लिए चाक भी बाहर से आती है।
उन्होंने कहा कि इसी वजह से अब अपने बेटे उमेश को पढ़ा रही हैं। ओपन यूनिवर्सिटी से बीए करने वाले उमेश ने बताया कि वह अपनी मां के साथ मिलकर दीया तैयार करता है। उन्होंने बताया कि रोजाना सत्रह से 18 घंटे काम करके वह उनकी मां दीये और दीपावली में उपयोग किए जाने वाले अन्य आइटम को तैयार करते हैं। उन्होंने कहा कि यह क्रिएटिव वर्क है। पहले दीपावली के बाद भी हरेक सीजन में मिट्टी के बर्तन, घड़े की सेल होती रहती थी लेकिन अब आधुनिकता की वजह से कोई घड़े आदि नहीं खरीदता है।
कैसे चलेगा तीन माह की दिहाड़ी में परिवार
दीया को पकाने की तैयारी कर रहे अशोक कुमार ने बताया कि उनके घर में पांच सदस्य हैं। उनका साल भर का यही काम है। दीपावली एक ऐसा त्यौहार है जिसके आते ही उनके परिवार के सभी सदस्य सारे कामकाज छोड़कर दीया और अन्य मिट्टी के आइटम तैयार करने में लग जाते हैं। रात को ग्यारह बारह बजे सोते हैं और सुबह चार बजे ही उठ जाते हैं। घर में छह बजे तक खाना तैयार होता है और फिर जुट जाते हैं काम पर।
उन्होंने कहा कि जो पैसा इस दौरान कमाते हैं उसके सहारे तीन माह का वक्त कट जाता है। लेकिन उसके बाद दिहाड़ी कमाने के सिवाय कोई चारा नहीं बचता है। गोपीचंद का हाल भी ऐसा ही है। वह बताते हैं कि परिवार में ग्यारह सदस्य हैं। सभी को यह काम आता है। दीया तैयार करने के लिए मिट्टी को सानना काफी कठिन काम होता है, इसके लिए उनका बेटा अमित काम करता है और चाक पर वह खुद बैठ जाते हैं।
तीन माह करते हैं दिहाड़ी, फिर सब खाली
कुम्हार कालोनी में मिट्टी को सानते कारीगर सुखलाल ने बताया कि वह तो तीन माह के लिए यहां काम करने के लिए आते हैं। यहां उनको साढ़े सात हजार रुपये की दिहाड़ी मिलती है। उनको दीया तैयार करने का सारा काम आता है और वह तीन माह काम भी करते हैं पर दीवाली के बाद उनके पास काम नहीं होता है। ऐसे में मेहनत मजदूरी करके अपना समय गुजारते हैं।
ऐसे तैयार किया जाता है दीया
दीया तैयार करने के लिए मिट्टी लाई जाती है। यह मिट्टी अब पंजाब से आती है। जिसे पहले कूटकर महीन किया जाता है। उसके बाद उसे पानी में डाल दिया जाता है और उसके बाद उसको साना जाता है। मिट्टी ठीक से सानने के बाद उसे चाक पर ले जाते हैं और दीया तैयार किया जाता है। दीये को पकाने के लिए पहले लकड़ी का बुरादा, फिर पाथी लगाई जाती है। आग से उसे पकाते हैं।