2015 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं में राजनीतिक लोगों को क्लीन चिट देने से कई पंथक नेताओं में रोष है। कारण यह है कि जिस रिपोर्ट को शनिवार को सीएम भगवंत मान ने पंथक नेताओं को सौंपा है, वह कैप्टन अमरिंदर सिंह के कार्यकाल में ही पूरी हो चुकी थी और उसमें 2020 में ही संत गुरमीत राम रहीम को नामजद कर लिया गया था। बहिबल कलां व कोटकपूरा गोलीकांड की जांच इस रिपोर्ट में नहीं है।
तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने 15 अक्तूबर को केस की जांच पंजाब पुलिस के डायरेक्टर ब्यूरो आफ इन्वेस्टिगेशन इकबालप्रीत सिंह सहोता की अध्यक्षता में एसआईटी बनाने और पूरे प्रकरण की न्यायिक जांच के लिए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस जोरा सिंह की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग का गठन किया। 16 अक्तूबर को तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने 14 अक्तूबर की घटनाओं के संदर्भ में पुलिस की तरफ से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज केस वापस लेने का एलान किया। पंजाब पुलिस की तरह उसकी एसआईटी भी आरोपियों को पकड़ने में नाकाम रही। हालांकि एसआईटी ने 20 अक्तूबर 2015 को सिख जत्थेबंदियों से जुड़े गांव पंजगराईं खुर्द से संबंधित दो भाइयों को केस में शामिल होने के आरोपों के तहत पकड़ा, लेकिन कई दिन रिमांड में रखने के बाद भी वह उनके खिलाफ कोई सबूत पेश नहीं कर पाई। आखिरकार उन्हें केस से डिस्चार्ज करना पड़ा।
एसआईटी के विफल रहने पर बैकफुट पर आई राज्य सरकार ने नवंबर 2015 में यह मामला केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के हवाले कर दिया। लंबी छानबीन के बाद इस केस में सीबीआई के हाथ खाली रहे। जस्टिस जोरा सिंह आयोग ने भी पड़ताल के बाद 30 जून 2016 को अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी थी लेकिन सरकार ने रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया। 2017 में जब सत्ता बदली और मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने विधानसभा चुनाव के समय किए गए वादे के मुताबिक 14 अप्रैल 2017 को हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस रणजीत सिंह की अध्यक्षता में जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन किया। आयोग ने बेअदबी की सभी घटनाओं की जांच के बाद 16 अगस्त 2018 को रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी। इस रिपोर्ट को पंजाब सरकार ने 27 अगस्त 2018 को पंजाब विधानसभा में पेश कर दिया। जस्टिस रणजीत सिंह आयोग की रिपोर्ट के बाद 28 अगस्त 2018 को पंजाब विधानसभा ने प्रस्ताव पारित कर बेअदबी की जांच सीबीआई से वापस लेने की घोषणा कर दी थी, जिसका 6 सितंबर 2018 को नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया था।
उधर, हरियाणा गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान और बरगाड़ी केसों की पैरवी करने वाले पंथक नेता बलजीत सिंह दादूवाल का कहना है कि जो रिपोर्ट सीएम भगवंत मान ने पंथक नेताओं को शनिवार को सौंपी है, वह तो 21 अप्रैल 2022 को सार्वजनिक हो चुकी है। अदालत में चालान पेश हो चुका है, जिसकी कॉपी तो मेरे पास भी आ गई थी। बात यह है कि पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अकाली नेताओं को बचाया, अब यह सरकार बचा रही है। जिस एसआईटी की रिपोर्ट का चालान पेश किया गया है, उसके एक बड़े हिस्से की जांच तो रणबीर सिंह खटड़ा ने की थी, जिसके बेटे को अकाली दल ने टिकट दी थी। बुनियाद ही बादल परिवार को बचाने के लिए रखी गई थी, इसलिए खटड़ा की कमेटी बनाई गई थी। बादल परिवार सीधे तौर पर बेशक श्री गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी करने का दोषी न हो, लेकिन गुरमीत राम रहीम की पीठ पर बादल परिवार का पूरा हाथ था। इसके बाकायदा सबूत हैं। 2012 में गुरमीत राम रहीम के खिलाफ केस को बादल सरकार ने वापस लिया। श्री अकाल तख्त साहब से गुरमीत राम रहीम को बादल परिवार ने माफी दिलाई। 2012 में बठिंडा में डेरे के श्रद्धालुओं की एकत्रता में बादल परिवार ने कई वादे किए थे। गुरमीत राम रहीम को कस्टडी में लाकर पूछताछ की जाती तो सच सामने आ जाता कि उसकी पीठ पर किसका हाथ था और किसने उसको पनाह दे रखी थी। क्या पनाह देने वाला गुनाह का भागीदार नहीं होता? पर अफसोस कैप्टन सरकार ने बादल परिवार को बचाने के लिए कार्य किया।
एसजीपीसी की सदस्य बीबी किरणजोत कौर का कहना है कि सीएम भगवंत मान को यह रिपोर्ट सिखों की संसद एसजीपीसी को सौंपनी चाहिए थी। अमरीक सिंह अजनाला सिख कौम का सिरमौर नहीं है, जिसको रिपोर्ट सौंपी गई है। हमारी सर्वोच्च संस्था एसजीपीसी है। इसमें कोई शक नहीं कि गुरमीत राम रहीम को बचाने के लिए पुरानी सरकारें यत्न करती रही हैं। इसमें अकाली दल या बादल परिवार का प्रत्यक्ष रूप से कोई हाथ नहीं है, क्योंकि एक राजनीतिक पार्टी वोट बैंक के लिए सबकुछ करती है।
पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने आरोप लगाया है कि पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार बरगाड़ी बेअदबी मामले को रफा-दफा करने की कोशिश कर रही है। बेअदबी पर एसआईटी की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए, प्रदेश अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री भगवंत मान से सवाल किया है कि धार्मिक नेताओं को रिपोर्ट सौंपना मामले की सत्यता की पुष्टि नहीं करता और वास्तविकता यह है कि आप केस को रफा-दफा करने की कोशिश कर रहे हैं।