घरेलू हिंसा कानून को पुरुषों के साथ भेदभाव वाला बताते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने समानता के अधिकार के प्रावधान को लागू करने की दिशा में कदम उठाने का हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ को सुझाव दिया है। हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ के घरेलू हिंसा के कई मामलों पर एक साथ सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया।
कोर्ट ने आदेश में कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानून मौजूद हैं, लेकिन देखा जाना चाहिए कि एक ही समस्या के लिए कई विकल्प देना कहां तक जायज है। महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देने का संकल्प 1981 में सभी राज्यों के लिए लिया गया था, लेकिन सच कुछ और ही है।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि एक्ट के बारे में जागरूकता की कमी है। कोर्ट ने कहा कि हरियाणा में 21 प्रोटेक्शन ऑफिसर है और उनमें एक भी पुरुष नहीं है, चंडीगढ़ में केवल पांच प्रोटेक्शन ऑफिसर हैं और सभी पुरुष है तथा पंजाब में 154 प्रोटेक्शन ऑफिसर हैं, जिनमें 30 पुरुष और बाकी 124 महिलाएं है।
कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा कानून के तहत मदद के लिए इतने कम अधिकारी हैं और जो हैं भी उनको अतिरिक्त कार्यभार दिया है। एक्ट को प्रभावी तरीके से कैसे लागू किया जा सकेगा। कोर्ट की प्रक्रिया पर भी हाईकोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि घरेलू हिंसा की शिकायत मिलते ही ट्रायल कोर्ट आरोपी को अपराधी समझने लगता है।
अक्सर शुरुआती दौर में ही गिरफ्तारी के लिए वारंट तक जारी कर दिया जाता है। कोर्ट ने कहा कि जज को ऐसे मामलों में यह प्रयास करना चाहिए कि किस प्रकार विवाद का निपटारा हो और प्रतिवादी पक्ष को भी इंसाफ का हक मिले। हाईकोर्ट ने अपने यह आदेश हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ के सभी न्याय अधिकारियों को सौंपने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ को इस दिशा में कदम उठाने का सुझाव दिया है।