वर्षों से चंडीकोटला में रहने वाले तीन सौ से अधिक परिवार अपना घर होकर भी बेघर हैं। आशियाने ढहने के बाद नींद तो किराए के मकानों मेें पूरी करते हैं, लेकिन सुबह होते ही खाने के लिए अपने घरों को लौट जाते हैं।
इसके बावजूद सरकार से उन्हें अपेक्षित मदद नहीं मिल रही है। ऐसे में ‘खानाबदोश’ की तरह जिंदगी जी रहे ज्यादातर लोगों ने इस बार दिवाली नहीं मनाने का फैसला लिया है।
उधर, वीरवार को चंडीकोटला में दो मकान ढहने के बाद शुक्रवार को नगर निगम के कार्यकारी अधिकारी दलबल के साथ मौके पर पहुंचे और इन क्षतिग्रस्त मकानों को ढहाया।
वीरवार को इन मकानों के ढहने से चंदन और संगीता के पैर टूट गए थे।
पीड़ित परिवार के सदस्य राकेश, उसके दोस्त रामकुमार, विनोद वर्मा और रानी ने कहा कि इस क्षेत्र की हालत बिगड़ने के कारण वे किराए के मकानों या सरकारी दफ्तरों के बाहर सोकर रात गुजार रहे हैं। इस बदहाली के कारण इस बार उन्होंने दिवाली नहीं मनाने का फैसला लिया है।
बेघर रहे तो वोट भी नहीं देंगे
चंडीकोटला के सैकड़ों परिवार के सदस्यों का कहना है कि अगर उनके लिए महफूज ठिकाना नहीं मुहैया कराया गया तो आगामी चुनाव में किसी पार्टी को वोट नहीं देंगे।
पहले भी हो चुके हैं हादसे
21 सितंबर को भी चार मकान ढह गए थे। प्रशासन की ओर से 12 अगस्त को लोगों के लिए 20 टेंट लगाए गए, लेकिन कुछ दिन बाद इनकी भी चोरी हो गई। इससे पहले 18 अगस्त को भी दो मकान धाराशायी हो गए थे।
वीरवार की घटना के बाद दोनों जर्जर मकानों को पूरी तरह तोड़कर हटा दिया गया। मलबे को भी हटा दिया गया है। पहले ही 52 मकानों को खतरनाक घोषित किया जा चुका है। चंडीकोटला वासियों से अपील है कि फिलहाल वे इन जर्जर घरों में नहीं रहें।
- ओपी सिहाग, कार्यकारी अधिकारी, नगर निगम