मुख्य सचिव ने कहा कि बीते 40 वर्षों में शहर की आबादी, पारिवारिक संरचना और रहन-सहन के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। नई तकनीक और बढ़ती जरूरतों को देखते हुए पुरानी नीतियों में आवश्यक संशोधन समय की मांग है।
गृह मंत्रालय (एमएचए) ने चंडीगढ़ प्रशासन को डी-रेगुलेशन को लेकर मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। इस एसओपी के आधार पर प्रशासन पुरानी नीतियों और नियमों की व्यापक समीक्षा करेगा ताकि शहर के चार दशक से लंबित मुद्दों का समाधान किया जा सके।
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मुख्य सचिव एच राजेश प्रसाद ने बताया कि विभिन्न विभागों से जुड़े मामलों का अध्ययन एसओपी के अनुरूप किया जा रहा है। प्रशासन की अलग-अलग समितियां बिंदुवार समीक्षा कर अपनी सिफारिशें तैयार कर रही हैं जिन्हें मंजूरी के लिए गृह मंत्रालय को भेजा जाएगा। उन्होंने कहा कि शेयर वाइज रजिस्ट्री, 38 हजार मकानों वाली पुनर्वास कॉलोनियों में मालिकाना हक, 22 गांवों में लाल डोरा विस्तार तथा लगभग 62 हजार मकानों वाले चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड में नीड-बेस्ड बदलावों के लिए वन टाइम सेटलमेंट पॉलिसी जैसे विषयों पर विशेष रूप से विचार किया जा रहा है। इन सभी मुद्दों पर एसओपी मार्गदर्शक दस्तावेज का काम करेगी।
मुख्य सचिव ने कहा कि बीते 40 वर्षों में शहर की आबादी, पारिवारिक संरचना और रहन-सहन के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। नई तकनीक और बढ़ती जरूरतों को देखते हुए पुरानी नीतियों में आवश्यक संशोधन समय की मांग है। उन्होंने बताया कि प्रशासक गुलाब चंद कटारिया समय-समय पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर शहर के अहम मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं ताकि जरूरी संशोधनों को मंजूरी मिल सके।
हर सेक्टर पर फोकस, कमेटियां गठित
डी-रेगुलेशन एसओपी के तहत इंडस्ट्रियल, कमर्शियल, रेजिडेंशियल और इंस्टीट्यूशनल सेक्टर में संभावित नीतिगत बदलावों की रूपरेखा तैयार की जा रही है। कई मामलों में नई समितियां गठित की गई हैं। पुनर्वास कॉलोनियों में मालिकाना हक और हाउसिंग बोर्ड मकानों में नीड-बेस्ड बदलाव जैसे विषयों पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है। प्रशासन अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में किए गए नीतिगत संशोधनों का भी अध्ययन कर रहा है ताकि शहर के अनुरूप प्रभावी और व्यावहारिक मॉडल अपनाया जा सके।
क्या है डी-रेगुलेशन
डी-रेगुलेशन का मतलब है पुरानी नीतियों और नियमों में कानूनी दायरे में रहते हुए आवश्यक संशोधन करना। केंद्र शासित प्रदेशों में ऐसे बदलावों के लिए गृह मंत्रालय की स्वीकृति अनिवार्य होती है। जारी एसओपी में यह साफ किया गया है कि किसी नियम में संशोधन से पहले अन्य राज्यों/यूटी में लागू मॉडल, पूर्व प्रावधानों और वर्तमान कानूनी स्थिति का अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद प्रस्ताव तैयार कर मंजूरी के लिए केंद्र को भेजा जाएगा। प्रशासन का दावा है कि इस प्रक्रिया से लंबे समय से लंबित मामलों में समाधान का रास्ता खुलेगा।