पुलिस द्वारा एक व्यक्ति को उसकी ही बेटी से दुराचार और हत्या के आरोप में फंसा दिए जाने के मामले में हरियाणा सरकार और डीजीपी हरियाणा मानवाधिकार के रवैये पर सोमवार को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जमकर फटकार लगाते हुए यहां तक कह दिया कि आपको शर्म आनी चाहिए।
आपके अधीन किसी व्यक्ति को ऐसी नाइंसाफी झेलनी पड़ी है और आप कोर्ट से यह कहने आ गए हैं कि कोर्ट अपने आदेश पर पुनर्विचार करे। दरअसल, सोमवार को हरियाणा सरकार और हरियाणा के डीजीपी मानवाधिकार की ओर से इस मामले में हाईकोर्ट के पहले दिए आदेश पर एक पुर्नविचार याचिका दाखिल कर आदेश ख़ारिज करने की मांग की थी।
जस्टिस के. कानन ने पुनर्विचार याचिका ख़ारिज करने के साथ ही राज्य सरकार को हाईकोर्ट द्वारा बीते वर्ष इस मामले में दिए आदेश के अनुसार पीड़ित पिता को 5 लाख रुपये मुआवजा दिए जाने के आदेश किए। उल्लेखनीय है कि पिछले साल पीड़ित राम सरूप को हरियाणा पुलिस ने अपनी बेटी के साथ दुराचार करने और फिर हत्या करने का आरोप लगा कर गिरफ्तार कर लिया था और असली गुनहगारों को बचाने की कोशिश की थी।
तब जस्टिस के. कानन ने राम सरूप की याचिका का निपटारा करते हुए हरियाणा सरकार को पीड़ित को 5 लाख रुपये मुआवजा अदा करने के आदेश दिए थे। यह मुआवजा हरियाणा सरकार को 9 प्रतिशत ब्याज के साथ वर्ष 1999 से अदा करना था। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिए थे कि दोषी पुलिस अधिकारियों जिनमें तत्कालीन एसपी और मामले के जांच अधिकारी शामिल थे, से मुआवजे की रकम की भरपाई की जाए। इसके साथ ही सरकार को 10 हजार रुपये हर्जाने के रुप में याचिकाकर्ता को देने के आदेश भी दिए थे।
अपने आदेशों में जस्टिस कानन ने कहा था की एक पिता को इससे अधिक क्या प्रताड़ित किया जा सकता है कि जिसकी बेटी से इतना संगीन अपराध हुआ हो और फिर उसी अपराध का आरोप पिता पर ही पिता पर लगा दिया जाए। ऐसे मामले में सिर्फ निर्दोष साबित होना ही काफी नहीं है बल्कि वह पुलिस अधिकारी जिन्होंने सही जांच न करके निर्दोष व्यक्ति को ही आरोपी बना दिया, उससे पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।
राम सरूप की बेटी की 1993 में दुराचार के बाद हत्या कर दी गई थी। इस मामले राम स्वरूप ने पुलिस को आरोपियों की जानकारी दी लेकिन वे सभी रसूखदार थे और पुलिस ने रसूखदार अपराधियों को पकड़ने की बजाय लड़की के पिता को ही बेटी से दुराचार कर हत्या किए जाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था।
बाद में लोगों के दबाव के चलते इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई तो जांच में पिता को निर्दोष साबित करते हुए सीबीआई ने पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिया था। इसके बाद राम सरूप ने इस मामले को लेकर वर्ष 1999 में याचिका दायर की थी।