टॉयलेट ब्लॉक घोटाले की जांच कर रही सीबीआई ने प्रशासक की मंजूरी के पहलू पर भी पड़ताल शुरू कर दी है। सीबीआई ने इस संबंध में नगर निगम को पत्र लिखकर जानकारी मांगी है।
पत्र में पूछा गया है कि सेलवेल कंपनी को 86 टॉयलेट ब्लॉक और 15 कनेक्टिंग पैसेज पर विज्ञापन लगाने के टेंडर के लिए एमसी पब्लिक हेल्थ डिवीजन नंबर-4 ने प्रशासक से मंजूरी ली थी या नहीं? सूत्रों की मानें तो निगम अफसरों ने प्रशासक की मंजूरी के बिना ही कंपनी को विज्ञापन लगाने के लिए टेंडर अलॉट कर दिया था।
जबकि, चंडीगढ़ एडवटाइजमेंट कंट्रोल ऑर्डर,1954 के तहत प्रशासक की मंजूरी ऐसे मामलों में जरूरी होती है। सीबीआई ने इस संबंध में निगम के ज्वाइंट कमिश्नर राजीव गुप्ता से जानकारी मांगी है।
निगम ने उतरवाए विज्ञापन
सीबीआई की सख्ती के बाद नगर निगम ने विभिन्न टॉयलेट ब्लॉक्स पर लगे विज्ञापनों को उतारना शुरू कर दिया है। बुधवार तक शहर के कई हिस्सों से होर्डिंग्स हटवा दिए गए थे।
सेलवेल कंपनी का टेंडर 31 मार्च को खत्म हो गया था, लेकिन फिर भी निगम ने कंपनी द्वारा टॉयलेट ब्लॉक्स पर लगाए गए विज्ञापनों को उतरवाया नहीं था।
ये है मामला
नगर निगम ने 2007 में सेलवेल कंपनी को 86 पब्लिक टॉयलेट के रखरखाव का टेंडर दिया था। निगम ने सभी नियमों को ताक पर रखते हुए कंपनी को टॉयलेट ब्लॉक्स पर एड लगाने की इजाजत दे दी।
इसके एवज में कंपनी से न तो जरूरी लाइसेंस फीस ली गई और न ही विज्ञापन शुल्क। कंपनी का टेंडर खत्म होने के बाद भी उन्हें दोबारा से एक्सटेंशन दे दी गई थी। कंपनी का एक्सटेंशन पीरियड 31 मार्च को खत्म हो गया था।