कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके बापूधाम निवासी 38 वर्षीय इंदर सिंह ने बताया कि उन्हें 27 अप्रैल को कोरोना की पुष्टि के बाद पीजीआई में भर्ती किया गया था। उनके साथ उनकी भतीजी नेहा भी कोरोना डेडीकेटेड हॉस्पिटल में थी। नेहा में 30 अप्रैल को कोरोना की पुष्टि हुई थी। उसके बाद से वो दोनों एक ही अस्पताल में अलग-अलग जगह पर भर्ती रहे।
इंदर और नेहा ने बताया कि इलाज के दौरान गुजारा गया एक-एक दिन खास अनुभव वाला रहा। उनके दिमाग में अस्पताल, डॉक्टर और सरकारी इलाज को लेकर जो छवि बनी हुई थी वह पूरी तरह से गलत साबित हुई है। पीजीआई में उन्हें एक घर जैसा माहौल मिला। डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, सफाई कर्मचारी सभी का व्यवहार इतना मधुर था कि एक पल के लिए भी यह अनुभव नहीं हुआ कि हम घर से दूर किसी जानलेवा बीमारी का इलाज कराने अस्पताल में भर्ती हैं।
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नेहा ने डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की काउंसलिंग के तरीके की तारीफ की और कहा कि उनके समझाने का अंदाज बिल्कुल ही अलग है। वह बातों-बातों में तनाव को कैसे छूमंतर कर देते हैं पता ही नहीं चलता। सीनियर डॉक्टर से तो हमें अपने बच्चों की तरह प्यार मिला। भर्ती रहने के दौरान एक बात ठीक से समझ में आई कि डॉक्टर के हाथ में ही वह जादू की छड़ी है जो एक मरीज को मौत के मुंह से बाहर ला सकती है।
पीजीआई से डिस्चार्ज होने वाले बापूधाम निवासी 40 वर्षीय बच्चू राम ने भर्ती रहने के दौरान हुए अनुभव को साझा करते हुए बताया कि परिवार से दूर रहकर भी उन्हें एक पल के लिए परिवार की कमी महसूस नहीं हुई। उन्हें 2 मई को पीजीआई में भर्ती किया गया था।
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अस्पताल में सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक और बीच-बीच में हमारा हालचाल लेने तक की जिम्मेदारी पीजीआई के डॉक्टरों और स्टाफ पर थी। उन्होंने इस दौरान अपनी ड्यूटी करने के साथ ही हमसे एक प्यार का रिश्ता भी बनाया। सुबह डॉक्टर आने पर सबसे पहले हमारी तबीयत के बारे में पूछते और फिर पूछते कि चाय पी की नहीं, नाश्ते में क्या खाया, कोई समस्या तो नहीं है, परिजनों से बात हुई कि नहीं।
उनकी यह सारी बातें सुनकर ऐसा लगता था जैसे मेरे परिवारवाले मेरे आसपास हैं। दवा देने का समय, प्रत्येक मरीज की गतिविधि पर बारीक नजर रखना, व्यवहार में शामिल प्यार और अपनापन अब तक के जीवन का सबसे खास अनुभव रहा।