भागती-दौड़ती जिंदगी में अचानक लगे ब्रेक और कोरोना के डर ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। लोगों में चिंता, डर, उदासी और हताशा भर सी गई है। कई लोगों ने आत्महत्या करने की कोशिश की तो कई लोगों ने खुदकुशी कर ली। 50 दिन के भीतर ट्राइसिटी में 12 से ज्यादा लोगों ने आत्महत्या की है।
हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि इन लोगों ने कोरोना या लॉकडाउन की वजह से आत्महत्या की, लेकिन यह तय है कि मुश्किल समय ने इनके अंदर डर, अकेलापन, चिंता बढ़ाई, जिसे वे सह नहीं पाए और अपनी जिंदगी खत्म कर डाली। पीजीआई के मनोरोग चिकित्सा के मनोचिकित्सक डॉ. स्वप्नजीत साहू मानते हैं कि कोरोना की वजह से लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर हुआ है।
लोगों के मन में डर बैठ गया है कि इसका कोई इलाज नहीं है। मरना तो तय है जबकि ऐसा नहीं है। कोरोना के 80 फीसदी मरीजों को कोई खतरा नहीं है। लेकिन लोग मानने को तैयार नहीं है। उनके पास सूचनाएं ठीक तरह से नहीं पहुंच रही है और भी कई डिस्आर्डर हैं, जिसके लोग शिकार हुए हैं।
इस तरह के मरीज पहुंच रहे हैं
पहला: जो कोरोना से बहुत ज्यादा डरे थे। उनके मन में यह बात घुस गई थी कि कोरोना का कोई इलाज नहीं है। इस बीमारी से मरने के बाद कोई रिश्तेदार भी नहीं आता है। डर की वजह से तनाव में आए और खुदकुशी की कोशिश की। ये वे लोग थे, जो छोटी-छोटी बातों में आशा छोड़ देते हैं। इस तरह के पेशेंट अब भी आ रहे हैं।
दूसरा: जब शराबबंदी हुई तो कुछ लोगों में शराब की तलब और बढ़ गई। लॉकडाउन बढ़ने के साथ वे सोचने लगे कि शायद अब उन्हें शराब नहीं मिलेगी। इससे उनमें तनाव बढ़ता गया। जब कोई उम्मीद नहीं दिखी तो उन्होंने आत्महत्या का रास्ता अपना लिया।
तीसरा: जो पहले से मानसिक बीमार थे। अचानक सबकुछ बंद होने से उनकी गतिविधियां बंद हो गई। इससे उनमें दोबारा से तनाव हो गया। अपने डॉक्टर के पास पहुंच नहीं पाए। इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जो ठीक हो चुके थे।
चौथा: इनमें वे लोग शामिल हैं, जो नई स्थिति के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते हैं। जब लॉकडाउन हुआ तो लोगों ने सोचा कि लंबी छुट्टी मिलेगी, लेकिन समय के साथ उनके लिए यह मुसीबत बन गई। इसे एडजस्टमेंट डिसॉर्डर कहते हैं। जब स्थितियां सामान्य होती है तो ऐसे लोग ठीक हो जाते हैं। ये डिस्आर्डर दांपत्य संबंधों में तनाव या कड़वाहट, कोई बड़ा बदलाव, आर्थिक परेशानी और किसी आशंका से पैदा होने वाले भय से आता है।
लोगों को क्या करना चाहिए
उदासी, मायूसी के बजाए आशावान बनें। तय समय पर सुबह उठें और रात के वक्त सोएं। देर से सोने से नींद का साइकिल टूट जाएगा। इससे तनाव बढ़ेगा। घर 45 मिनट से एक घंटे की एक्सरसाइज करें। बच्चों के साथ इनडोर गेम्स खेले। बच्चों की ऑनलाइन क्लासेज को सुपरवाइज करें। गार्डनिंग, नई रेसिपी बनाना या अपनी हॉबी को समय दें। ऐसा शेड्यूल बनाएं जिससे अपने आपको व्यस्त रखें। जो पहले से मानसिक बीमार थे, वे डॉक्टर के संपर्क में रहे।
लोगों के पास कोरोना की सही जानकारी नहीं पहुंच रही है। इस वजह से वे तनाव में आ रहे हैं। लोगों को उम्मीद बनाए रखनी चाहिए कि जल्द ही सबकुछ ठीक हो जाएगा। खुद को और परिवार को व्यस्त रखें। ऐसा माहौल बनाएं ताकि सभी भी इन्वाल्वमेंट बनी रहे।
- डॉ. स्वप्नजीत साहू, असिस्टेंट प्रोफेसर, मनोचिकित्सा डिपार्टमेंट, पीजीआई