चंडीगढ़ में बिना मास्क घूमते लोगों को अवेयर करते पुलिसकर्मी।
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चंडीगढ़ में कोरोना ने जब दस्तक दी थी तब संक्रमित होने का सीधा मतलब था, मौत के मुंह में जाना। लोग इतने दहशत में थे कि जरा सी सर्दी जुकाम होने पर तनाव में आ जा रहे थे। वहीं, कई लोग ऐसे भी थे, जो इस वायरस की चपेट में आ गए और गंभीर स्थिति तक पहुंच गए। कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहे लेकिन हिम्मत नहीं हारी। इस खतरनाक वायरस को अपने हौसले से हराकर कोरोना वीर बने। कोरोना को मात देने वाले इन लोगों का कहना है कि जिंदगी को जीने का जज्बा और आत्मविश्वास हो तो कोई आपको हरा नहीं सकता। इन लोगों ने समाज को संदेश दिया है कि कोरोना से डरें नहीं, अपना आत्मविश्वास और जिंदादिल बने रहें। हिम्मत और मजबूती के साथ कोरोना का सामना करें, जीत जरूर होगी। इन सभी लोगों ने डाक्टरों के प्रयासों की भी काफी सराहना की।
दिल में ही जज्बा तो कोरोना को हराना कोई मुश्किल नहीं
मेयर के रूप में मेरा कार्यकाल शुरू होने के साथ ही शहर में कोरोना वायरस ने दस्तक दे दी थी। कुछ समय तो ठीक से गुजरा लेकिन जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए मैं कब संक्रमित हो गई, पता ही नहीं चला। तबीयत ज्यादा बिगड़ी तो मोहाली के अस्पताल में भर्ती हुई। स्थिति नियंत्रण से बाहर होते देख वहां से डॉक्टरों ने पीजीआई रेफर किया। पीजीआई के कोविड अस्पताल में 20 दिनों तक भर्ती रही। अस्पताल के अंदर एक-एक सेकेंड काटना घंटों के बराबर होता था लेकिन मैंने उस समय को भी ऐसे नहीं गुजरने दिया। योग और मेडिटेशन को अपनी दिनचर्या में शामिल किया। इनके बल पर मेरा आत्मबल काफी मजबूत हुआ। भजन सुनकर मन को एकाग्र किया। साथ ही लोगों की दुआएं बहुत काम आईं। बहुत लोगों ने मुझे संदेश भेजकर मेरा हौसला बढ़ाया और मेरे अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। मैंने खुद को कोरोना से जंग में जीत के लिए तैयार किया और अंत में जीत मेरी हुई। -राजबाला मलिक, पूर्व मेयर व वर्तमान पार्षद
दो बार हुआ कोरोना, मगर हिम्मत नहीं हारी.. जीतकर घर लौटा
पिछले साल 23 सितंबर को मुझे कोरोना हुआ। बुखार आया और फिर खांसी शुरू हुई। घर में ही एक कोने में क्वारंटीन रहा लेकिन पत्नी भी संक्रमित हो गईं। एक अक्तूबर को मैं कोरोना मुक्त हो गया लेकिन आठ अक्तूबर को फिर बुखार आ गया। जांच कराई तो फिर से कोरोना की पुष्टि हो गई। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि ये कैसे हो गया लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। जीएमएसएच-16 अस्पताल में भर्ती रहा। उसी समय डायरिया ने घेर लिया। हालत बिगड़ती गई और बुखार तेज होता गया। उसके बाद चिकित्सकों ने पीजीआई रेफर कर दिया। पीजीआई में 17 दिन तक इलाज चला। तमाम परेशानियां हुईं लेकिन जिंदगी से हार मानने का ख्याल कभी मन में नहीं आया। मन में यही था कि जिंदगी की जंग हर हाल में जीतनी है। फिर क्या था, इसी जज्बे के साथ लड़ा और आखिरकार कोरोना को हरा ही दिया। यदि हिम्मत हार जाता तो सबकुछ बिगड़ जाता। मेरा लोगों से यही कहना है कि कोरोना को गंभीरता से लें और सावधानियां बरतें। लापरवाही न करें। मास्क जरूर लगाएं। -डा. राजीव कुमार, वार्डन, ब्वॉयज हास्टल संख्या एक, पीयू
योग व कसरत के साथ कविताएं लिख खुद को किया पॉजिटिव
कोविड के मरीजों के बीच ड्यूटी करते हुए मैं कब पॉजिटिव हो गया पता ही नहीं चला। अचानक एक दिन सांसें उखड़ने लगीं तो जांच कराई, पता चला मैं संक्रमित हो चुका हूं। स्थिति बिगड़ी तो पीजीआई के कोविड अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। 17 दिनों तक कोरोना से जंग जारी रही लेकिन अंत में जीत मेरी ही हुई। हां, उन 17 दिनों में एक-एक पल सदियों जैसे महसूस हो रहे थे। परिवार से दूर अकेले एक ओर जहां कोरोना क्या करेगा, इस बात का डर सता रहा था, वहीं परिवार किस हालत में होगा, यह चिंता खाए जा रही थी लेकिन उस स्थिति में मैंने खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। खाना कम खाता था और व्यायाम ज्यादा करता था। सुबह 1 घंटे योग और मेडिटेशन को समय देने लगा। भजन और सुगम संगीत को तनाव दूर करने का माध्यम बनाया। इसके साथ ही कविताएं लिखने के शौक को भी हथियार के रूप में प्रयोग किया। कविता के माध्यम से एक कोरोना योद्धा की कहानी पॉजिटिव होने से पहले और पॉजिटिव होने के बाद की स्थिति को शब्दों में पिरोया। सच कहूं इन चीजों ने मेरा आत्मबल और विश्वास इतना ज्यादा बढ़ा दिया कि मेरी स्थिति बहुत तेजी से सुधरने लगी। मेरा मानना है कि धैर्य और आत्मबल के साथ ही शारीरिक मजबूती को बढ़ाने वाले उपायों को आत्मसात कर कोरोना की गंभीर स्थिति से भी बाहर निकला जा सकता है। -श्याम सुंदर सागर, पीजीआई नर्सिंग ऑफिसर
कोरोना से आईसीयू में पहुंचा, हौसले ने पंख लगाए
11 नवंबर 2020 को सांस लेने में तकलीफ हुई। खांसी होने लगी तो वह पीजीआई की इमरजेंसी में भर्ती हो गया। उसके बाद 12 नवंबर को कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। इससे घबराहट बढ़ गई। सांस लेने में अधिक तकलीफ हुई तो आईसीयू में पांच दिन तक भर्ती रहा। उसके बाद दूसरे वार्ड में आया और वहां चार दिन रखा गया। आखिर में डिस्चार्ज हुआ तो घर पर ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहा। दस दिसंबर तक ऑक्सीजन का प्रयोग घर पर किया। तकलीफ जरूर हुई लेकिन इस बीच हौसला नहीं खोया। धैर्य बनाए रखा। यह सब पीजीआई के चिकित्सकों और आईसीयू स्टाफ का कमाल है, जिनकी वजह से मुझे नया जीवन मिला। उन्होंने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया। मुझे कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। आज मैं बिल्कुल स्वस्थ हूं। मेरा मानना है कि जीवन में चाहे जितनी मुश्किलें आएं, लेकिन कभी भी अपने आपको कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए। यदि मुश्किल वक्त पर मैं कमजोर पड़ जाता तो मेरे साथ क्या होता, मुझे भी नहीं पता। मेरी सभी लोगों से अपील की है कि मास्क जरूर लगाएं। सावधानी बरतें क्योंकि कोरोना एक बार फिर पांव पसारने लगा है। -डा. केवल कृष्ण, पूर्व वेटरनरी डॉक्टर, जीरकपुर