कोरोना से संघर्ष में डॉक्टर निस्वार्थ सेवा में जुटे हैं। वे न तो दिन देख रहे हैं और न ही रात। अपनी धुन में मस्त संक्रमण के खतरे के बीच जब उन्हें अपनों की जरूरत थी, तो वे अपने परिवार से दूर रहे। बहुत ही कम समय में कोविड 19 से लड़ने के लिए उन्होंने अपने आपको तैयार किया। मरीजों की जान बचाने के साथ खुद को भी खतरे से बचाया।
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सेवाभाव देखकर देश ने उन्हें कोरोना योद्धा का नाम दिया। डॉक्टर्स डे के मौके पर धरती के भगवान को सैल्यूट करना तो बनता है। अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का पालन करते हुए अमर उजाला ने इस खास मौके पर कोविड 19 से जुड़े डॉक्टरों के अनुभव को जाना। वेबिनार के जरिए वे अमर उजाला से जुड़े और अपने तजुर्बे को साझा किया।
80 दिन हो गए, परिवार से ठीक तरह से बात नहीं कर पाए
पीजीआई कोविड हॉस्पिटल के डॉ. रश्मि राजन गुरु ने बताया कि कोविड 19 हर दिन एक नया चैलेंज लेकर आया। 80 दिन हो गए, लेकिन परिवार से ठीक तरह से बात नहीं कर पाया। फोन आता था तो काट देता था। जब मां या कोई दूसरा सदस्य बीमार होता, तभी घरवालों से बात होती थी। कई बार घर से फोन आता था और मां पूछती थी कहां हो तो उनसे झूठ बोलना पड़ता था कि हॉस्पिटल में नहीं हूं। रूम पर आराम कर रहा हूं, जबकि हम लोग हॉस्पिटल में रहते थे। कोरोना से लड़ना आसान नहीं है।
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कम समय में कोविड 19 हॉस्पिटल तैयार किया
पीजीआई कोविड हॉस्पिटल के नोडल आफिसर डॉ. नवीन पांडेय ने बताया कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती कोरोना हॉस्पिटल को तैयार करना था। इसके अलावा डॉक्टर से लेकर सफाई कर्मचारी तक को उस बीमारी के लिए प्रशिक्षित करना था, जिसके बारे में दुनिया को ज्यादा कुछ नहीं पता था। एक हफ्ते में ही नेहरू एक्सटेंशन बिल्डिंग को कोविड डेडिकेटेड हॉस्पिटल में तब्दील कर दिया। हर काम के लिए एक प्रोटोकॉल तैयार करना पड़ा, ताकि कोई चूक न हो। टीम वर्क की वजह से कुछ ही वक्त में 200 बेड का कोरोना हॉस्पिटल बनाकर तैयार कर दिया।
पीपीई किट पहनकर काम करना आसान नहीं था
पीजीआई के डॉ. अंकुर लूथरा ने बताया कि कोरोना पॉजिटिव मरीजों क ो दाखिल करने का निर्देश मिलने के साथ ही खतरा बढ़ गया था। शुरुआत में थोड़ा डर लगा, क्योंकि विश्व की बड़े देशों ने इसके आगे घुटने टेक दिए थे। इसके बावजूद डॉक्टरों ने 24 घंटे ड्यूटी दी। सबसे बड़ा जोखिम पीपीई किट को पहनना और उतारना था। इसमें थोड़ी सी लापरवाही कोरोना का खतरा बढ़ा सकता था। इसके लिए पहली बार देश में पीजीआई ने वीडियो सर्विलांस की व्यवस्था की। इससे फायदा यह हुआ कि हमारी टीम का एक भी सदस्य कोरोना से संक्रमित नहीं हुआ।
डॉक्टरों का तनाव दूर करने की व्यवस्था की
पीजीआई कोविड हॉस्पिटल के डॉ. शिव सोनी ने बताया कि कोरोना से लड़ने के लिए डॉक्टरों ने अपने आपको को तकनीक से भी जोड़ा। पीजीआई ने ऑनलाइन तकनीक को भी एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। प्रत्येक यूनिट को ऑनलाइन से एक-दूसरे से जोड़ा गया, जिससे सीनियर डॉक्टर 24 घंटे संपर्क कर प्रत्येक मरीज को तत्काल इलाज मुहैया करवा सके। डॉक्टर से लेकर सफाई कर्मचारियों तक के मानसिक तनाव को दूर करने के लिए भी इंतजाम करने पड़े।
परिवार औैर फर्ज के बीच सामंजस्य बनाकर दी ड्यूटी
नेशनल आयुष मिशन से जुड़े डॉ. राजीव कपिला ने बताया कि कोरोना से जुड़ा हर अनुभव नया रहा है। ट्रेनिंग और क्वारंटीन सेंटर से जुड़े काम में आयुष के डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई गई। कोविड की टीम से जुड़कर गर्व महसूस हुआ। अपनी जिम्मेदारी निभाने के साथ मरीजों व अन्य लोगों को रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की जानकारी देते रहे। परिवार और फर्ज के बीच सामंजस्य बनाकर अपनी ड्यूटी को अंजाम दिया।
जीएमएसएच 16 के डॉ. संजीव शर्मा ने बताया कि उन्हें कोविड मरीजों के लिए ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी मिली थी। शुरुआत में काफी परेशानी आई, क्योंकि हर काल पर तत्काल एंबुलेंस भेजनी पड़ती थी। यह काम आसान नहीं था, लेकिन टीम की बदौलत सब कुछ संभव हो सका। इस काम में ड्राइवर व हेल्पर का अहम रोल रहा। वे इस गर्मी में भी पीपीई किट पहनकर 24 घंटे लगातार काम करते रहे।
फरवरी से कोरोना मिशन में जुटे हैं
जीएमएसएच 16 के डॉ. हनी साहनी ने बताया कि फरवरी से हमारे डॉक्टर मिशन में जुटे हैं। 24 घंटे की ड्यूटी कर रहे हैं। आईडीएसपी व कंटेनमेंट जोन की जिम्मेदारी हमारे पास थी। इसमें सबकी निगाह रहती थी और हमें बेस्ट से बेस्ट देना पड़ता था। यह एक दूसरे के सहयोग से ही पूरा हो पाया है। कोरोना ने टीम वर्क की ताकत से रू-ब-रू कराया। हमारे लिए हर अधिकारी व कर्मचारी भूमिका महत्वपूर्ण थी। सीनियर ने हमारा उत्साह बढ़ाया तो जूनियर ने हर कदम पर साथ दिया।
कोविड से जुड़ी ट्रेनिंग की जिम्मेदारी संभाली
जीएमएसएच 16 के डॉ. कपीश गुप्ता ने बताया कि अस्पताल प्रशासन ने उन्हें कोविड से जुड़ी ट्रेनिंग कराने की जिम्मेदारी सौंपी थी। अचानक से इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलने पर थोड़ा डर लगा, लेकिन धीरे-धीरे डर दूर हो गया। शुरुआत में जब स्टाफ की कोविड वार्ड में ड्यूटी लगाई जाती थी तो वे मना करते थे, लेकिन अब स्थिति ठीक उलट हो चुकी है। अब स्टाफ खुद से अपनी ड्यूटी कोविड वार्ड में लगवा रहे हैं।
कई दिनों तक पिता से नहीं मिल पाई
मनीमाजरा सिविल हास्पिटल की गाइनी की वरिष्ठ डॉ. सरिता मेहरा ने बताया कि हॉस्पिटल के साथ घर पर भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना पड़ा। कई दिन बीत गए, लेकिन पिता से नहीं मिल पाए। उनके 90 साल के होने की वजह से उचित दूरी बनाना जरूरी था। अस्पताल में अलग तरह की जिम्मेदारी निभा रही थी। कोरोना पॉजिटिव सिजेरियन डिलीवरी कराई, जो एक अलग तरह का अनुभव था। शुरुआत में डर लगता था, मगर उच्च अधिकारियों के मार्गदर्शन से सबकुछ आसान हो गया।