भाजपा हरियाणा विधानसभा चुनाव को लेकर जातीय गणित में उलझ गई है। पार्टी हाईकमान तय नहीं कर पा रहा है कि चुनावी जंग की कमान जाट नेता को सौंपी जाए या गैर जाट को।
कांग्रेस से चौधरी बीरेंद्र सिंह समेत विभिन्न नेताओं के लिए भाजपा ने पलक पावड़े तो बिछा दिए हैं, लेकिन वह कुलदीप बिश्नोई जैसे गैर जाट नेताओं को भी अपने साथ रखना चाहती है।
जातीय समीकरणों में उलझने के कारण भाजपा विधानसभा चुनाव प्रचार में इनेलो और कांग्रेस से पिछड़ती दिख रही है। इनेलो ने तो 62 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करने के साथ ही चुनावी घोषणा पत्र भी जारी कर दिया है,
जबकि मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने चुनाव रैलियां शुरू कर दी हैं और अब अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाने के लिए 15 चुनावी रथ भी रवाना कर दिए हैं। दूसरी तरफ, भाजपा और हरियाणा जनहित कांग्रेस गठबंधन को लेकर अभी संशय बरकरार है।
कुलदीप बिश्नोई के नेतृत्व में चुनाव नहीं लड़ेगी बीजेपी
वैसे यह साफ हो चुका है कि भाजपा किसी भी सूरत में कुलदीप बिश्नोई के नेतृत्व में चुनाव मैदान में जाने को तैयार नहीं है। बदली परिस्थितियों में हजकां को 30 से ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं है, जबकि खुद 60 सीटों पर लड़ना चाहती है, लेकिन हजकां अब भी पुराने फार्मूले पर डटी है।
इसके अलावा भाजपा की मुश्किल यह भी है गुटबाजी को लेकर वह कांग्रेस से किसी भी मामले में पीछे नहीं है। मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के दावेदार माने जा रहे कैप्टन अभिमन्यु, ओम प्रकाश धनखड़ और मनोहर लाल खट्टर से लेकर प्रदेश अध्यक्ष रामबिलास शर्मा और विधायक दल केनेता अनिल विज में से कोई भी पार्टी के भीतर सर्वमान्य चेहरा नहीं बन पा रहा है।
इसलिए भाजपा ने हजकां के साथ गठबंधन करते समय बिश्नोई को सीएम उम्मीदवार मान लिया था, लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद अब वह गैर जाट नेता को चुनावी कमान सौंपने से हिचक रही है। कांग्रेस और इनेलो में जाट नेतृत्व के पास ही कमान है।
बीजेपी की कोशिश, जाटों-गैर जाटों को जोड़कर रखने की
उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर घटना के बाद जिस तरह से देशभर में जाट समुदाय भाजपा से जुड़ा है, उससे भाजपा उत्साहित है। हरियाणा में जाट समुदाय वैसे तो 27 फीसदी है, लेकिन प्रदेश की 90 सीटों में से 47 जाट बहुल हैं और नौ सीटों पर वह दूसरे स्थान पर है।
भाजपा की कोशिश है कि जाट बिरादरी के साथ ही दूसरी तरफ प्रदेश में 73 फीसदी गैर जाट समुदाय को भी जोड़े रखा जाए। प्रदेश में जाट सुमदाय के बाद 19.50 फीसदी दलित हैं, इनमें भी 10 फीसदी चमार हैं। ब्राह्मण और पंजाबी समुदाय सात-सात फीसदी व सिख मात्र चार फीसदी हैं, इसलिए भाजपा जातीय समीकरणों को नहीं सुलझा पा रही है।