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गलत इंजेक्शन से आंखों की रोशनी को खतरा, PGI और दवा कंपनी में ठनी

Sat, 16 Jul 2016 06:20 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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गलत इंजेक्शन के इस्तेमाल से आंखों की रोशनी को खतरा होने के मामले में पीजीआई और दवा कंपनी के बीच ठन गई है। प्रतिबंधित कैंसर दवा एवेस्टिन को लेकर कई मतभेद सामने आ रहे हैं। पीजीआई में एवेस्टिन हादसे पर इस दवा को बनाने वाली कंपनी रोशे के प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा है कि पीजीआई ने आंखों के लिए दवा का गैर अधिकृत इस्तेमाल किया है। यह दवा कैंसर के इलाज के लिए है।
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आंखों के इलाज के लिए न तो अमेरिका के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने मंजूरी दी और न ही भारत सरकार ने। साल 2004 में अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने  इसे कैंसर के इलाज के लिए मंजूरी दी थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एवस्टिन को आवश्यक दवाओं की सूची में रखा है।

दूसरी ओर पीजीआई का दावा है कि इसी साल नौ मार्च को ड्रग कंट्रोलर जरनल आफ इंडिया की ओर से एवेस्टिन को आंखों के उपचार के लिए आफ लेबल इस्तेमाल की मंजूरी दी गई है। अमेरिका सहित पूरी दुनिया में आंखों की कई बीमारियों के इलाज के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है।
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पीजीआई ने कहा, एवेस्टिन का इस्तेमाल जारी रहेगा
पीजीआई की ओर से कहा गया है कि एवेस्टिन का इस्तेमाल मरीजों की आंखों के इलाज के लिए जारी रहेगा। एवेस्टिन का इस्तेमाल साल 2007 से किया जा रहा है। अब तक 15 हजार से ज्यादा इंजेक्शन लगाए जा चुके हैं। इससे पहले कोई भी साइड इफेक्ट देखने को नहीं मिला है। यह दवा अन्य दवाओं के मुकाबले काफी सस्ती है। एवेस्टिन के पक्ष में हजारों पब्लिकेशन हैं, जो बताते हैं कि आंखों की बीमारियों में  इसका इस्तेमाल काफी फायदेमंद है।

आई विशेषज्ञ बोले, रामबाण है दवा
पीजीआई के एडवांस आई सेंटर के पूर्व एचओडी प्रोफेसर आमोद गुप्ता ने बताया  कि एवेस्टिन मरीजों के लिए पूरी तरह से लाभदायक है। पूरे विश्व में एवेस्टिन के रोजाना लाखों इंजेक्शन लगाए जाते हैं। यह दवा मुख्य रूप से डायबिटीक रेटीनोपैथी (डायबिटीज के बाद आंखों की रोशनी कम होना) और मैकुलर डीजेनरेशन (आंखों की रोशनी जाना) के इलाज में रामबाण साबित हुई है। इससे कई मरीजों की आंखों की रोशनी वापस आ चुकी है।

एक शीशी में बनते हैं 30-40 डोज
विशेषज्ञों ने बताया है कि एवेस्टिन के एक एमएल में 20 डोज बनाए जाते हैं। जितना कम डोज होगा, वह उतना फायदेमंद होता है। शीशी में चार एमएल होता है। इस हिसाब से 80 डोज बनाए जा सकते हैं, लेकिन शीशी से दवा निकालने और भरने की प्रक्रिया के दौरान कुछ एमएल दवा बर्बाद होती है। ऐसे में एक शीशी से 30-40 डोज बनाए जाते हैं।

ऐसे लगाया जाता है इंजेक्शन
यह इंजेक्शन आंखों के सफेद वाले हिस्से में लगाया जाता है। इसमें जिस सुई का इस्तेमाल किया जाता है, वह काफी बारीक होती है। इसे आंख के विशेषज्ञ ही लगा सकता है। इसे लगाने के लिए काफी एहतियात बरतनी होती है, ताकि किसी भी प्रकार का इंफेक्शन न हो। विशेषज्ञों ने बताया कि जिस तरह से बड़े आपरेशन की तैयारी की जाती है, ठीक उसी तरह से एवेस्टिन के इंजेक्शन के नियम पूरे करने होते हैं। पीजीआई और बड़े संस्थानों पूरे प्रोटोकाल के साथ एवेस्टिन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं।

मरीज के परिजनों कहा, पीजीआई पर पूरा भरोसा
पीजीआई में दाखिल मरीजों के परिजनों ने कहा है कि उन्हें पीजीआई के इलाज पर पूरा भरोसा है। वे पहले भी पीजीआई से इलाज कराते रहे हैं। मनाली  के मानचंद की आंखों में भी दिक्कत आई थी। वे एडवांस आई सेंटर में एडमिट हैं। उनकी पत्नी विमला ने बताया कि पीजीआई के डाक्टरों पर हमें कोई शक नहीं है। उनकी तरफ से इलाज में कोई कोताही नहीं हो सकती। उनके रिश्तेदार पीजीआई आए थे और वे अब पूरी तरह से ठीक हैं। उम्मीद है कि पीजीआई मेरे पति की आंख ठीक कर देगा। ऐसा ही कुछ खरड़ के हरीश शर्मा का कहना है। उनका कहना है कि वे खुद 50 से ज्यादा मरीजों को पीजीआई के आई सेंटर में दिखवा चुके हैं। उन्हें कभी परेशानी नहीं आई है। सबके के सब ठीक हैं। हमें पीजीआई के इलाज पर पूरा विश्वास है।

कहां से आया बैक्टीरिया
आई सर्जन व विशेषज्ञ बताते हैं कि इंजेक्शन में स्टेनोट्रोफोमोनस मेल्टोफिला नामक बैक्टीरिया मिला है, जो नमी में पनपता है। गीली मिट्टी, टायलेट आदि में तेजी से ग्रो करता है। यह हास्पिटल के वातावरण में भी मिलता है। इसलिए इसे हास्पिटल एक्वायर्ड इंफेक्शन भी कहते हैं।
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