चंडीगढ़ के सरकारी स्कूलों के बच्चों को अब जापान, फिनलैंड और सिंगापुर की तर्ज पर शिक्षा मिलेगी। शिक्षा विभाग ने एक गैर सरकारी संस्था के साथ मिलकर शिक्षा के लिए आदर्श इन देशों की शिक्षा पद्धति से श्रेष्ठ चुनकर बुनियादी पढ़ाई की नींव तैयार की है।
आधारभूत शिक्षा पर काम कर रही सामाजिक संस्था कच्ची सड़क के सहयोग से विदेशी शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन कर विभाग ने स्कूलों में किलकारी प्रोजेक्ट के तहत प्री प्राइमरी कक्षाओं के लिए प्रोटोटाइप क्लासरूम तैयार किए हैं। अब इस मॉडल को शहर के दूसरे स्कूलों में भी लागू करने की तैयारी चल रही है।
धनास के जीपीएस में बनाई कक्षा एक, दो और किशनगढ़ के जीएमएचएस में कक्षा एक, दो और तीन की खास बात यह है कि इसमें किताबी ज्ञान से हटकर क्लासरूम को एक खेल मैदान की तरह तैयार किया गया है। इसमें बच्चे को सामान्य ज्ञान और पढ़ने-लिखाने से अधिक उनके सर्वांगीण विकास पर ध्यान दिया है।
किलकारी को सफल बनाने में इनका रहा योगदान
अंबाला, उत्तर प्रदेश आदि विभिन्न जगहों में रह रहे स्वयंसेवियों ने किलकारी प्रोजेक्ट में अपना योगदान दिया। किसी ने शोध कार्य में तो किसी ने क्लासरूम डिजाइन करने में मदद की। किलकारी को कार्यक्रम अधिकारी फ्रेनी और मोनिका के नेतृत्व में नेहा और 50 से अधिक अन्य स्वयंसेवियों ने व्यवहारिक स्वरूप में लाया।
बिना दीवारों और बच्चों की लंबाई के अनुसार डिजाइन किया स्कूल
जापान के फूजी शहर में एक ऐसा किंडरगार्टन बनाया गया है जहां न तो दीवारें है और न ही कोई सेक्शन। साथ ही नल, वॉशबेसिन से लेकर हर चीज को बच्चे की लंबाई के अनुसार डिजाइन है। गोलाकार आकृति में बनाए भवन में बच्चे अपनी मनमर्जी अनुसार कहीं भी आ जा सकते हैं और मनपसंद गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं। इस मॉडल के आधार पर चंडीगढ़ में एक ही कमरे में विभिन्न गतिविधियां शामिल की गई हैं और बच्चों की लंबाई के अनुसार फर्नीचर डिजाइन किया है।
सिंगापुर में भाषा के तौर पर पढ़ाई जाती है गणित
सिंगापुर में गणित को भाषा के तौर पर पढ़ाया जाता है, जिसमें बिना कॉपी पर गुणा-भाग किए बच्चे व्यावहारिक रूप से विषय सीखते हैं। इस मॉडल के आधार पर किशनगढ़ में बनाई बाल वाटिका में मिनी मैथ्स स्टेशन बनाया जिसमें तरह-तरह की गतिविधियां कर बच्चे बिना कॉपी, पेन के गणित को सीख सकें।
फिनलैंड से लिया खेल, प्रकृति का समावेशी मॉडल
पीसा (प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेस्मेंट) में हमेशा उच्च रैंक प्राप्त करने वाले फिनलैंड की शिक्षा पद्धति खेल, इनडोर-आउटडोर एक्टिविटी और प्रकृति का मिश्रण है। वहां स्कूल का समय कम है और बच्चों को कोई होमवर्क नहीं दिया जाता। साथ ही हर 45 मिनट के बाद बच्चों की आउटडोर ब्रेक होती है। चाहे बारिश हो या धूप ब्रेक के समय बच्चों को क्लासरूम से बाहर आना होता है। इसके आधार पर क्लासरूम के अलावा प्री प्राइमरी में कॉरिडोर और बाहरी गतिविधियों के लिए तैयार किया गया है। बच्चों को प्रकृति से जोड़ने के लिए पेड़ों के बीच चलने का और बैठने का अलग से ढांचा तैयार किया है।
पांच सिद्धांतों पर तैयार की कक्षाएं
1. कम लागत और पर्यावरण अनुकूल कक्षा बनाना
कक्षा बनाने का अहम हिस्सा कम लागत और पर्यावरण अनुकूल कक्षाएं बनाना था ताकि कम बजट में भी अन्य स्कूलों में इस मॉडल को अपनाया जा सके। इसी के तहत
किशनगढ़ में बनाई कक्षा एक, दो और तीन को बनाने में कुल सात लाख का खर्च आया जिसमें 75 प्रतिशीत चीजें अपशिष्ट पदार्थों से तैयार की गई हैं।
2. चलनशील होगा ढांचा
चंडीगढ़ के स्कूलों में अधिक बच्चे और सेक्शन होने के नाते कक्षाओं में चलनशील फर्नीचर बनाया है। उदाहरण के तौर पर वहां बनाई ट्रॉली में टायर लगाए गए हैं, जिससे
उसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।
3. स्वयं सीखने के तरीके पर केंद्रित
बच्चा रट्टा पद्धति का शिकार न हो इसलिए कक्षा को स्वयं सीखने के तरीके पर केंद्रित किया है। साधारण बेंच और अध्यापक की निश्चित जगह देने के बजाय कक्षा को 360
डिग्री में बनाया गया है। हर कोने में विभिन्न तरह की गतिविधियां जैसे संगीत, रंगमंच कक्ष आदि बनाए गए हैं। साथ ही इसमें गोल टेबल, फ्लोर जैसे अलग-अलग तरह के
बैठने के मॉडल सम्मिलित हैं।
4. नई शिक्षा नीति में इन बातों का रखा ध्यान
- शारीरिक विकास
- रचानात्मक और कलात्मक विकास
- संवेदी विकास (सेंसरी डेवलपमेंट)
- साक्षरता और संख्यात्मक विकास
- संज्ञानात्मक विकास
5. प्लानिंग में क्षेत्रीय कारीगरों का योगदान
कक्षा डिजाइन करने में कच्ची सड़क के साथ क्षेत्रीय कारीगरों ने अपना योगदान दिया। कक्षा में बनाए हर चित्र, हर टेबल, कुर्सी के लिए कारीगरों ने भी चर्चा में भाग लिया और
बच्चों की जरूरतों को समझकर चीजें तैयार की।