विश्व अस्थमा (दमा) दिवस पर मैक्स सुपर स्पैशिएलिटी हॉस्टिपटल (एमएसएसएच) मोहाली ने सोमवार को मानव मंगल स्कूल सेक्टर 21 में दमा की पहचान और इस पर नियंत्रण कैसे पर एक स्वास्थ्य परिचर्चा का आयोजन किया गया। इसमें मानव मंगल स्कूल की 10वीं क्लास के 200 से अधिक स्टूडेंट्स और टीचर्स ने हिस्सा लिया।
मैक्स के सीनियर कंसलटेंट डा. अरपिंदर गिल ने बताया कि ट्राइसिटी में स्कूल जाने वाले 20 बच्चों में एक बच्चा दमा से प्रभावित है। इस रोग का एक प्रमुख कारण आधुनिक शहरीकरण और वातावरण में बढ़ता प्रदूषण है। दमा को काफी हद तक आसानी से नियंत्रित और ठीक किया जा सकता है।
दमा के संकेतों और लक्षणों को पहचान कर इलाज करवाना महत्वपूर्ण है। अस्थमा रोगियों को ये ना सिर्फ अनुवांशिक कारणों से हो सकता है बल्कि कई सामाजिक-आर्थिक कारक भी इसका आधार बन सकते हैं।
ये हैं लक्षण
डॉ.गिल ने बताया कि ये सांस संबंधी समस्याओं के कारण भी हो सकता है। फेफड़ों में हवा के मार्ग अवरुद्ध हो सकता है और इसके चलते फेफड़ों में हवा सामान्य से कम रहने लगती है। इसके संकेतों में छाती में खिंचाव महसूस होना, खांसी या अधिक छींक आना भी शामिल हैं।
दमा एक दम से भी विकसित हो सकता है और ये हल्के से लेकर जानलेवा अटैक तक कर सकता है, जिसमें सांस पूरी तरह से रुक सकती है। अन्य संकेतकों में छाती की ऊपर और रिब्स की त्वचा अंदर की तरफ खिंचना और नथुने फूलना, होंठ नीले पड़ना और नाखून पीले पड़ना, थकान और हताश महसूस करना, पीलापन आना और दुर्गंधभरा पसीना आना शामिल हैं।
स्कूल के टीचर को दें प्रशिक्षण
डॉ.गिल ने कहा कि स्कूलों में बच्चों में दमा की पहचान कर प्रबंधन स्कूल में ही दमा के ट्रिगर्स को न्यूनतम किया जा सका है। स्कूल को अपने कुछ टीचर्स को भी प्रशिक्षित करना चाहिए और स्कूल की हेल्थ नर्स या डॉक्टर को भी इस बारे में जानकारी हो ताकि वे फर्स्ट एड थैरेपी दे सकें।
दमा के साथ पहचान होने पर स्टूडेंट्स पर लगातार नजर रखी जाए। स्कूल को ऐसे बच्चों की जान जोखिम में पैदा होने वाली परिस्थितियों से निपटने के लिए अपने आप को तैयार रखना चाहिए और एक स्पष्ट योजना होनी चाहिए कि इमरजेंसी में किस से संपर्क किया जाना है।