आज अदालत ने गुरमीत राम रहीम सहित तीन अन्य दोषियों निर्मल सिंह, कृष्ण लाल, कुलदीप सिंह को ताउम्र उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह फैसला हमारे लिए अच्छा है। मेरे पिता के हत्यारों को जो सजा मिली है, हम इससे संतुष्ट हैं। समाज में इस तरह का अपराध करने से पहले लोग सौ बार सोचेंगे। कोर्ट ने इस तरह का फैसला देकर न्याय की आस लगाए लोगों का हौसला बढ़ाया है। सीबीआई के वकील एसपीएस वर्मा की ओर से केस की दलीलें पुख्ता तौर पर रखी गई थीं।
छत्रपति की पत्नी का बयान
इस लड़ाई में जितना हीरो मेरा बेटा अंशुल है उतने ही वो जज हैं, जिन्होंने राम रहीम समेत चारों को दोषी ठहराया है। मैं जज साहब का शुक्रिया अदा करती हूं, जिन्होंने फैसला सुनाया। वे हमारे लिए रोल मॉडल हैं, ऐसे जज सभी पीड़ितों को मिलें, तभी न्याय हो सकेंगे। फैसले से न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास ओर बढ़ा है। - कुलवंत कौर, पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की पत्नी
सिस्टम ने दिया सबसे अधिक दर्द
श्रेयसी ने कहा कि पिता को न्याय दिलाने में सबसे अधिक दर्द परिवार को सिस्टम से मिला है। पापा की आखिरी इच्छा थी कि डेरा प्रमुख का चेहरा बेनकाब हो और उनकी इसी इच्छा ने ही हमें जज्बा दिया। वह सिस्टम को बताना चाहती हैं कि जनता टीआरपी या वोट बैंक के लिए नहीं है, सिस्टम को हर इंसान की भावना की कद्र करनी चाहिए।
श्रेयसी ने अपने पिता को न्याय दिलाने में किए गए संघर्ष के लिए भाई अंशुल का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि उनका भाई मात्र 21 साल का था जब यह दर्दनाक घटना हुई। जिस उम्र में युवा अपने करियर बनाने के लिए संघर्ष में जुट जाते हैं, उस उम्र में भाई ने पिता को न्याय दिलाने के लिए कचहरियों के चक्कर काटने शुरू किए। वह अपने छोटे-छोटे बच्चों को घर छोड़कर कोर्ट में तारीखें भुगतने पहुंचता था। हालांकि इस दौरान जहां कुछ अच्छे लोग साथ खड़े रहे, वहीं कुछ पीछे भी हट गए। लेकिन उनसे भी उन्हें सीख मिली कि न्याय की लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ती है।
कई एनजीओ ने की केस खर्च उठाने की मांग
श्रेयसी ने बताया कि 16 सालों के दौरान बहुत सी सामाजिक संस्थाओं और एनजीओ ने कोर्ट केस का खर्च उठाने को कहा, लेकिन भाई अंशुल इसके लिए कभी तैयार नहीं हुए। वह पापा को स्वयं न्याय दिलाना चाहते थे। वह नहीं चाहते थे कि पापा को न्याय दिलाने के नाम पर कोई राजनीति करे। वह अकेले ही न्याय के लिए लड़ते रहे।
फिर से छपेगा ‘पूरा सच’ अखबार
श्रेयसी के अनुसार, उनका और उनके पिता का सपना था कि वह इलेक्ट्रानिक मीडिया में रिपोर्टिंग करें, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद परिस्थितियां विपरीत होती चली गईं और उन्हें पत्रकारिता का शिक्षण के रूप में चयन करना पड़ा। श्रेयसी ने कहा कि अब जब उन्हें न्याय मिल गया है तो वह अपने भाइयों के साथ मिलकर पिता द्वारा चलाए गए अखबार ‘पूरा सच’ को फिर से शुरू करेंगी।