चंडीगढ़ के सेक्टर-21 की रहने वाली 70 साल की इंद्रजीत नंदा को बचपन में रॉक गार्डन से जो प्रेरणा मिली थी, बढ़ती उम्र भी उसे कम नहीं कर पाई। वह लैंडस्केपिंग और बागवानी करने के लिए प्रेरित हुई। उन्होंने बताया कि स्व. नेकचंद सैनी की कारीगरी को देखकर वह काफी प्रभावित हुई थीं। उस दिन से उन्होंने सोच लिया था कि वह कुछ अलग करेंगी।
उसके बाद उन्होंने बागवानी और लैंडस्केपिंग करना शुरू किया। उन्होंने बिना किसी की सहायता लिए यह कार्य शुरू किया। आज उनके घर में 250 से ज्यादा गमले हैं जिनमें 20 तरह के पौधे लगे हुए हैं। घर में धूप न आने के कारण वह फूल कम संख्या में लगाती हैं, क्योंकि फूलों को खिलने के लिए धूप मिलना बहुत आवश्यक है।
चायपत्ती के पानी से पौधे रहते हैं हरे
नंदा ने बताया कि पौधे बहुत ही नाजुक होते हैं। परिवार के सदस्य की तरह उनकी देखभाल करनी जरूरी होती है। जिस प्रकार इंसान को स्वस्थ रहने के लिए अच्छे खाने की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार पौधों को भी खाद, पानी और अन्य चीजों की आवश्यकता होती है। चायपत्ती के पानी और उबले हुए अंडे के छिलके को पीसकर जड़ों में डालने से पौधे हरे-भरे रहते हैं। इसके अलावा कीड़ों से बचाने के लिए सीमित मात्रा में मीठे सोडे को पानी में मिलाकर पौधों में डालना चाहिए।
एक माली की भी लेती हैं सहायता
इंद्रजीत नंदा ने बताया कि 60 साल की उम्र तक वह पौधों को पानी देने से लेकर पीले पत्ते तोड़ने तक का काम अकेले कर लेती थीं। अब उम्र ज्यादा होने से वह ज्यादा काम नहीं कर पाती हैं, इसलिए अब इस काम में मदद के लिए एक माली को रखा है। नंदा ने बताया कि खुड्डा लाहौरा में उनका फार्म हाउस है, जिसमें हजारों पौधे लगे हुए हैं। यह फार्म हाउस चार एकड़ में है। पिछले 20 साल से वह इस फार्म हाउस में पौधों की देखभाल कर रही है। वहीं पर वह पशुओं के गोबर से खाद बनाती हैं।
अमेरिका में बनाकर आईं बगीचा
नंदा ने बताया कि उनकी बागवानी और लैंडस्केपिंग को देखकर अमेरिका में रहते एक रिश्तेदार ने उन्हें बुलाया और इसी प्रकार का बगीचा उनसे बनवाया। 20 साल पहले उन्हें दुबई से भी लैंडस्केपिंग और बागवानी करने के लिए ऑफर आए थे।
सीमेंट, बजरी, रेत से करती हैं लैंडस्केपिंग
इंद्रजीत ने बताया कि सीमेंट, बजरी और रेत से वह लैंडस्केपिंग करती हैं। इसी से उनकी पहचान बनी है। उन्हें बागवानी का इतना शौक है कि वह अलग-अलग प्रकार के स्टेच्यू अपने बगीचे के लिए बनाती रहती हैं। हर प्रकार से वह अपने बगीचे को सजाने की कोशिश करती हैं। उनका कहना है कि इसी मेहनत से उनकी पहचान बनी है।