चंडीगढ़ में ट्रैफिक समस्या बढ़ती जा रही है। जिस सड़कों पर कुछ साल पहले इक्का-दुक्का गाड़ियां दिखाई देती थीं, वहां अब जाम की स्थिति है। अधिकारियों के अनुसार पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत कर ही इससे निपटा जा सकता है। इसलिए सीटीयू ने अपनी बसों को स्मार्ट बनाने का काम शुरू कर दिया है। शहरवासी 31 मार्च से 100 बसों को ओला-उबर की तरह मोबाइल पर ट्रैक कर सकेंगे, लेकिन शहर में जब बस क्यू शेल्टर ही नही हैं तो बसों को स्मार्ट बनाने का क्या फायदा है।
इंटेलीजेंस ट्रांसपोर्ट सिस्टम (आईटीएस) के तहत सभी बसों को बस क्यू शेल्टर के साथ जोड़ा जाएगा ताकि लोगों को मोबाइल एप पर पता चल सके कि कौन सी बस कितनी देर में पहुंचेगी। इसके अलावा बस क्यू शेल्टर पर बस के आने और जाने का समय भी डिस्प्ले किया जाना है। बसों को स्मार्ट करने पर सीटीयू करोड़ों खर्च कर रहा है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इन शेल्टर के नहीं बनने से आईटीएस का कुछ खास फायदा नहीं होने वाला है।
नाम न छापने की शर्त पर इंजीनियरिंग विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि अगले हफ्ते फिर से बस क्यू शेल्टर के लिए टेंडर लगाए जाएंगे। यह पांचवीं बार होगा, जब टेंडर लगाए जा रहे हैं। अगर कंपनियां आती हैं तो काम अलॉट करने के बाद एक साल का समय दिया जाएगा, जबकि अक्तूबर में सीटीयू की सभी बसों को स्मार्ट बनाने का काम पूरा हो जाएगा।
पूर्वी सेक्टरों में कंक्रीट तो दक्षिणी सेक्टरों में लोहे के बनेंगे बस शेल्टर
प्रशासन ने पहले पूरे शहर में लोहे के बस शेल्टर बनाने का फैसला लिया था, लेकिन पूर्वी सेक्टरों को हेरिटेज का दर्जा प्राप्त होने की वजह से मामला अटक गया। कहा गया कि लोहे के बस क्यू शेल्टर ली कार्बूजिए के विचारों के खिलाफ हैं, इसलिए प्रशासन ने यह फैसला लिया है कि पूर्वी सेक्टरों में कंक्रीट के बस शेल्टर बनाए जाएंगे, जबकि दक्षिणी सेक्टरों में लोहे के बस शेल्टर बनेंगे। गौरतलब है कि सैंपल के तौर पर सेक्टर-17 के हिमालय मार्ग पर प्रशासन के इंजीनियरिंग विभाग की ओर से एक बस क्यू शेल्टर बनवाया भी गया है।
294 बस क्यू शेल्टर बनने हैं नए, 203 होंगे रेनोवेट
प्रशासक वीपी सिंह बदनौर के आने के बाद नए सिरे से बस शेल्टर को बनाने की तैयारी की गई थी। कुल 497 में से 294 बस क्यू शेल्टर नए बनने हैं, जबकि 203 बस क्यू शेल्टर रेनोवेट होने हैं। यह बस शेल्टर बिल्ट ऑपरेट ट्रांसफर (बीओटी) के आधार पर है। बीओटी का मतलब यह है कि कंपनी बस क्यू शेल्टर को बनाएगी और उस पर एडवरटाइजमेंट भी लगाएगी। बहुत कम कंपनियां ऐसी हैं, जो दोनों काम करती हों। इसी वजह से इंजीनियरिंग विभाग की ओर से कई टेंडर निकालने की पहल की गई, लेकिन हर बार उसे निराशा ही हाथ लगी।
हाईकोर्ट भी पहुंचा है मामला
जून 2019 में टेंडर की प्री-बिड मीटिंग में कंपनियों ने आपत्ति जताई कि बस क्यू शेल्टर को बनाने का काम और उस पर एडवरटाइजमेंट लगाने का काम अलग-अलग होना चाहिए। इस पर जो कमेटी बनी वह टेंडर की तारीखों को आगे बढ़ाती रही। इस मामले में एक कंपनी पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में भी याचिका दायर कर चुकी है। मामला अभी लंबित है।