कस्टमर जूते खरीदता है तो वह उसे अपने घर या गाड़ी तक हाथों में ले नहीं जा सकता। कैरी बैग मुहैया कराने की जिम्मेदारी से कंपनियां भाग नहीं सकतीं। यह टिप्पणी स्टेट कमीशन ने बाटा की याचिका को खारिज करते हुए की। बाटा ने फोरम के आदेशों को स्टेट कमीशन में चुनौती दी थी, जिसे खारिज कर दिया गया। स्टेट कमीशन ने अपने आदेशों के कई ऐसे केसों का हवाला दिया, जिसमें जबरन ग्राहकों से कैरीबैग के पैसे वसूले जा रहे थे।
स्टेट कमीशन ने लाइफस्टाइल इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड वर्सेज पंकज चांदगोठिया के केस का भी हवाला दिया, जिसमें कमीशन ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि कैरी बैग के पैसे चार्ज करना कंपनियों के लिए कमाई का जरिया बन गया है। बड़े रिटेल स्टोर ग्राहकों को लुभाने के लिए 60 से 70 फीसदी तक डिस्काउंट ऑफर करते हैं, क्या वे 10 रुपये का कैरी बैग मुफ्त में नहीं दे सकते। अगर कंपनियां सही मायने में ही पर्यावरण का ध्यान रखती हैं तो उन्हें अपने ग्राहकों को मुफ्त में कैरीबैग देना चाहिए।
स्टेट कमीशन ने बाटा के खिलाफ फोरम की ओर से सुनाए गए आदेशों को बरकरार रखा है। अब बाटा को आने वाले सभी ग्राहकों को मुफ्त में कैरी बैग देना होगा। साथ ही शिकायतकर्ता को बाटा कंपनी को पेपर कैरीबैग के लिए चार्ज किए गए 3 रुपये लौटाना होगा। मानसिक पीड़ा व उत्पीड़न के लिए 3 हजार और एक हजार रुपये मुकदमा खर्च देना होगा। कंपनी को राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग चंडीगढ़ के सेक्रेटरी के नाम पर कंज्यूमर लीगल ऐड अकाउंट में 5 हजार रुपये भी जमा करवाने के निर्देश दिए गए हैं।