अपनी बेटियों के साथ एमएल गुप्ता, अजय शर्मा और निगम आयुक्त आनिंदिता मित्रा।
- फोटो : अमर उजाला
जो काम बेटियां कर सकती हैं कोई नहीं कर सकता। लड़कों से उनकी तुलना ही बेमानी है। बात परिवार की हो या कम उम्र में जिम्मेदारी लेने की। बेटियां हमेशा आगे रहीं हैं। यही कारण है कि बेटे की चाह कभी हुई नहीं। अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर अमर उजाला ने चंडीगढ़ के कुछ ऐसे माता-पिता से बात की जिनकी इकलौती बेटियां हैं। माताओं ने कहा कि बेटियां हमेशा बेटों से ज्यादा ख्याल रखती हैं। एक मां की तरह बेटियां जब खाने के लिए पूछतीं हैं और देर होने पर पूरे अधिकार के साथ घर जल्दी आने के लिए कहतीं हैं तो सारी चिंताएं खत्म हो जाती हैं।
एक बेटी ने जीवन की सारी इच्छाओं को पूरा किया आयुक्त
नगर निगम आयुक्त आनिंदिता मित्रा ने बताया कि शुरू से ही उन्हें बेटी की चाह थी। शायद पहले बेटा पैदा होता तो जीवन में बेटी की कमी रह जाती। बेटी हुई तो जीवन की सारी इच्छाएं पूरी हो गईं। वह 17 साल की उम्र में ही एक मां की तरह मेरा ख्याल रखने लगी है। ऑफिस जाने से आने तक वह मेरी चिंता करती है। बेटी कम वह दोस्त ज्यादा है। यह अहसास उसे भी होता है। एक दूसरे से हम सारी बातें साझा करते हैं। बेटी नहीं वो मेरी दुनिया है।
छोटी सी उम्र में जिम्मेदारी समझने लगी है बेटी
सेक्टर-18 निवासी समाजसेवी मंजुला सलारिया के पति डीआरडीओ में हैं। मंजुला ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को पढ़ाने का काम करती हैं। मंजुला कहती हैं इकलौती बेटी होने के चलते वह हमेशा मेरे साथ रहती है। सात साल की उम्र में वह काफी समझदार हो गई है। मैं अपने परिवार और समाज की सेवा करती हूं तो वह भी जिम्मेदारी को समझती है। कभी उसने समय की कमी को लेकर परेशान नहीं किया। उसे पूरा समय मिले इसलिए कभी दूसरे बच्चे या बेटे के बारे में नहीं सोचा।
दो घरों की खुशियों की चाबी है हिमांशी
पीजीआई में टेक्निकल असिस्टेंट के पद पर कार्यरत एमएल गुप्ता ने कहा कि 25 साल पहले जब मुझे बेटी हुई तो ऐसा लगा जैसे ईश्वर ने मेरा घर खुशियों से भर दिया। मेरी मां की इच्छा थी कि मुझे एक बेटा भी हो लेकिन मैंने और मेरी पत्नी अनीता ने तय किया कि बस हिमांशी (बेटी) ही हमारी दुनिया होगी। मां कहती थीं कि कम से कम दो संतान होनी चाहिए। बाद में उन्हें भी अहसास होने लगा कि बेटियां बेटों से कम नहीं हैं। अब वह कहती हैं हिमांशी को ईश्वर ने दो घरों में खुशियां बांटने के लिए भेजा है।
ईश्वर ने एंजल को देकर मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया
सुरक्षा विभाग में कार्यरत अजय शर्मा ने कहा कि मेरी इकलौती बेटी एंजल अब 13 साल की हो चुकी है। उसके जन्म के बाद ही मैंने और मेरी पत्नी गगन ने तय कर लिया था कि अब हमें दूसरी संतान नहीं चाहिए। मेरा मानना है कि बेटों से बेटियों की तुलना ही गलत है। बेटियां जो कर सकती हैं वह कोई नहीं कर सकता। बेटियों से घर की रौनक होती है। एंजल की बात कहूं तो उसे हम दोनों की भावनाएं बिना कहे समझ आ जाती हैं। जब कभी मैं उसे कोई उपहार लाकर देता हूं तो वह फट से कह देती है कि पापा आप तो मेरे सेंटाक्लॉज हो, फिर मुझे उपहार की क्या जरूरत है। ईश्वर ने बेटी का पिता बनाकर मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।
कभी महसूस ही नहीं हुआ कि मुझे बेटा नहीं है
भविष्य निधि विभाग से सेवानिवृत्त राकेश पाल मोदगिल कहते हैं मेरे लिए मेरी बेटी सबकुछ है। मैं बहुत भाग्यशाली हूं। मेरी बेटी दिन में तीन बार फोन पर हाल पूछती है। मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मुझे बेटा क्यों नहीं हुआ। बेटियां तो दो घरों की शान होती हैं। कुछ लोग समझते हैं कि बेटा न होना ठीक नहीं है लेकिन आज मैं अपनी बेटी के दम पर बहुत खुश हूं।