पत्र को समाप्त करते हुए उन्होंने ‘क्षमा का प्रार्थी’ शब्द का प्रयोग किया था। ऐसी चर्चा आम थी कि इस माफी पत्र को सुखबीर बादल के आदेश पर अकाली दल के दिग्गज डॉ दलजीत सिंह चीमा खुद अमृतसर में श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार के पास लेकर गए थे। ज्ञानी गुरबचन सिंह का कहना था कि तख्त के जत्थेदारों द्वारा पंथक परंपरा के अनुसार विचार-विमर्श करने के बाद भेजे गए क्षमा याचना व स्पष्टीकरण को स्वीकार किया गया है।
इस फैसले के बाद पंजाब में तूफान खड़ा हो गया था। सिख संगत सड़कों पर आ गई। एक माह बाद डेरा मुखी को जाम-ए-इंसां पिलाने के मामले में दी गई माफी को रद्द कर दिया गया। जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह ने कहा कि डेरा मुखी को माफ करने का जो फैसला 24 सितंबर को लिया गया था, उसे सिख संगत की भावनाओं को देखते हुए रद्द किया जाता है। इस माफी का सारा ठीकरा अकाली दल के सिर पर फोड़ा गया।
डेरा संचालक के रिश्तेदार को सरकारी पंप अलॉट किया
अकाली दल के साथ डेरा सच्चा सौदा का रिश्ता इतना गहरा चुका था कि उनकी सरकार में डेरा संचालक के रिश्तेदार को जालंधर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट की जमीन पर पेट्रोल पंप अलॉट कर दिया गया। इस पंप को लेकर कई तरह की अनियमितताएं बरती गईं। उस समय जालंधर ट्रस्ट के चेयरमैन अकाली दल के वरिष्ठ नेता थे।
सूत्रों की माने तो ट्रस्ट की फाइल को बहुत तेजी से मूव करवाकर रातों रात पंप का कब्जा दिलाया गया। इस फाइल को काफी समय तक दबाकर रखा गया था। इसे लेकर काफी शिकायतबाजी भी हुई लेकिन शिअद भाजपा सरकार ने कार्रवाई नहीं की। इस फाइल की अगर जांच शुरू हुई तो कई नेताओं के चेहरे से नकाब उतरना तय है।