मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद संक्रमण का शिकार हुई आंखों से लेंस निकाला जाना कितना सही है, इस सवाल के जवाब में एक्सपर्ट ने जो जानकारी दी, वह हर किसी को पता होनी चाहिए।
हरियाणा में मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद सुडोमोनाज एरुजिनोसा बैक्टीरिया का शिकार हुए मरीजों की संख्या ने सरकार को हिला कर रख दिया है। अब नेत्र सर्जनों व मरीजों के दिमाग में सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है कि संक्रमित आंखों से लेंस को निकाला जाना कितना सही है और कितना गलत। पीजीआईएमएस रोहतक व पीजीआईएमआर चंडीगढ़ ने संक्रमित मरीजों की आंखों का स्पेशल ऑपरेशन किया है। अब सभी को चिकित्सा के शीर्ष संस्थानों के परिणाम का इंतजार है।
पीजीआईएमएस चंडीगढ़ में 21 के करीब मरीजों की आंखों का ऑपरेशन किया गया था। वहीं पीजीआईएमएस रोहतक में अब तक भिवानी, करनाल व झज्जर से 52 मरीज उपचार के लिए आ चुके हैं। इसमें से 41 मरीजों की विटेक्ट्रमी सर्जरी मंगलवार शाम तक नेत्र विभाग के एक्सपर्ट डॉक्टरों ने पूरी कर दी है। दावा है कि रोहतक में किसी मरीज की आंखों से लेंस नहीं निकाला गया है, जबकि सूत्र दावा करते हैं कि चंडीगढ़ की टीम ने खतरा मोल न लेते हुए कुछ मरीजों के लैंस निकाल लिए हैं।
अब देखना होगा कि दोनों चिकित्सा संस्थानों में हुए ऑपरेशनों में से कितने मरीजों की रोशनी वापस लौटती है। एक्सपर्ट मानते हैं कि महज दिखाई देने और पूरा दिखाई देने की क्वालिटी में फर्क होता है। हालांकि प्रदेश में चल रही स्थिति को देखते हुए कोई स्पष्ट तौर पर बोलने को तैयार नहीं है।