पंजाब यूनिवर्सिटी के आर्थिक हालात एकदम से ही खराब नहीं हुए। इसकी जमीन साल चार साल पहले उस वक्त तैयार हो गई थी, जब केंद्र सरकार के अधीनस्थ यूजीसी ने अपने सालाना नान-प्लान बजट बढ़ने के बावजूद उसमें से पीयू को जारी हिस्सा कम कर दिया। जैसे-जैसे यूजीसी का सालाना नान-प्लान बजट बढ़ता गया, वैसे-वैसे पीयू का हिस्सा कम होता गया। इस वजह से भी पीयू के आर्थिक हालात ज्यादा गड़बड़ा गए।
पीयू के वाइस चांसलर अरुण ग्रोवर ने इस मसले से भी गवर्नर वीपी बदनौर को अवगत करवाते हुए मामले में हस्तक्षेप कर पीयू को अतिरिक्त ग्रांट दिलवाने की मांग की है। उधर, इसी मसले को लेकर यूजीसी ने सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दाखिल की हुई है, जिसपर सुनवाई अभी विचाराधीन है। हालांकि पीयू के वीसी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना अतिरिक्त ग्रांट के पीयू का सुचारु संचालन अब बहुत मुश्किल हो चुका है। वीसी अरुण ग्रोवर का कहना है कि जब यूजीसी का सालाना प्लान बढ़ा है, तो यूजीसी को पीयू को जारी ग्रांट का हिस्सा भी बढ़ाना चाहिए,
इस तरह घटना गया पीयू का हिस्सा
वर्ष 2013-14 में मानव संसाधान एवं विकास मंत्रालय ने यूजीसी का नान-प्लान बजट 1757.57 करोड़ तय किया था। उसमें से पीयू को जारी होने वाले पंजाब यूनिवर्सिटी का हिस्सा 9.27 फीसदी था। इसी तरह वर्ष 2014-15 में यूजीसी का नान प्लान बजट 1929.97 करोड़ हो गया, लेकिन इसमें से पीयू को जारी हिस्सा घटकर 9.12 प्रतिशत रह गया। उसके बाद वर्ष 2015-16 में एमएचआरडी ने यूजीसी को 2135.36 करोड़ का नान प्लान बजट जारी किया, लेकिन इसमें से पीयू को जारी हिस्सा और घटकर 8.24 फीसदी रह गया। इसी तरह वर्ष 2016-17 में यूजीसी को नान प्लान बजट 2441.91 करोड़ जारी किया गया, लेकिन इसमें से पीयू को जारी हिस्सा और घटकर 7.20 प्रतिशत ही रह गया। इस तरह जैसे-जैसे एमएचआरडी यूजीसी का नान प्लान बजट बढ़ाता गया, वैसे-वैसे यूजीसी की ओर से पीयू को जारी हिस्सा घटता गया।