15 दिसंबर को होने जा रहे पंजाब यूनिवर्सिटी के सिंडिकेट चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। हर ग्रुप ने बाजी मारने के लिए रणनीति तैयार की है। ग्रुपों के गठबंधन का भी दौर चल रहा है। अब तक की तैयारियों को देखें तो गोयल ग्रुप इस बार भी सिंडिकेट में मजबूती के साथ पैर रखेगा। राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस ग्रुप के खाते में 9 से 10 सीटें जाएंगी।
उनके किले को भेद पाना आसान नहीं होगा। गोयल ग्रुप के एक सदस्य ने तो यहां तक दावा किया है कि यदि सुभाष शर्मा ग्रुप उनके साथ आ गया तो किसी के हिस्से में सीटें नहीं जाने देंगे। यानी 15 की 15 सीटों पर गोयल ग्रुप कब्जा कर लेगा। स्थिति भी यही बन रही है। सूत्रों का कहना है कि डीएवी व सुभाष शर्मा ग्रुप का गठबंधन चुनाव तक चल पाना आसान नहीं दिख रहा।
डीएवी के एक सदस्य ने जिस दावे से 10 दिन पहले सुभाष शर्मा ग्रुप के साथ गठबंधन होने की बात कही थी, अब उनकी आवाज में दम नजर नहीं आ रहा। राजनीतिक पंडित भी यही मानते हैं कि इन दोनों ग्रुपों का चुनाव तक चल पाना संभव नहीं दिख रहा। हालांकि गठबंधन की बाद दबे मन से दोनों ही ग्रुप स्वीकार रहे हैं और यदि गठबंधन इनका रहा तो फिर यह ग्रुप भी किसी से पीछे नहीं रहेगा।
सिंडिकेट चुनाव हो या फिर सीनेट...रणनीति तय करता है गोयल ग्रुप
सिंडिकेट के चुनाव हों या फिर सीनेट के। इन चुनावों में होता वही है जो गोयल ग्रुप रणनीति तय करते हैं। उनके किले को अब तक कोई नहीं भेद पाया। इस बार भी गोयल ग्रुप एक हैं। इन ग्रुपों का साइंस, लॉ, मेडिकल व कंबाइंड फैकल्टी पर जबर्दस्त कब्जा है। यहां से सीधे 9 सीटें उनके हिस्से में आ रही हैं। आर्ट्स में चुनाव की उम्मीद है, यहां भी कड़ा मुकाबला है।
इसी तरह लैंग्वेज में भी चुनाव होगा। माना जा रहा है कि यह पांच सीटें चुनाव के दायरे में आएंगी। यहां से भी गोयल ग्रुप एक या दो सीटें अपने पक्ष में ले जाने के दावे कर रहा है। सुभाष शर्मा व डीएवी ग्रुप भी एक रहने पर दस सीटें लेने के दावे किए जा रहे हैं लेकिन आधार क्या होगा? इसके लिए अभी रणनीति नहीं बनी है।
डीएवी के एक सदस्य ने तो इशारा कर दिया कि सुभाष शर्मा ग्रुप चुनाव आते आते उनसे अलग हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो परिणाम एकतरफा होंगे। हालांकि सुभाष शर्मा ग्रुप अब तक डीएवी के साथ जुड़ा हुआ है और सीटें भी 10 तक लाने के दावे किए जा रहे हैं।
पिछले चुनाव की भरपाई कर सकते हैं गोयल बंधु
पिछले सिंडिकेट चुनाव में डॉ. नवदीप गोयल व अशोक गोयल एक हो गए थे और डीएवी को साथ लेते हुए सभी सीटों पर कब्जा कर लिया था। सुभाष शर्मा ग्रुप को अलग करने से उनके हिस्से में एक भी सीट नहीं आई। पिछले साल की टीस अभी सुभाष ग्रुप में बरकरार है। सूत्रों का कहना है कि गोयल ग्रुप उसकी भरपाई इस साल कर सकते हैं।
यानी एक या दो सीटें अधिक दी जा सकती हैं। अगर ऐसा हुआ तो फिर सीनेट में जो ग्रुप सुभाष शर्मा के साथ हैं वह सुभाष से किनारा कर सकते हैं। हालांकि वर्ष 2020 में नई सीनेट का गठन होगा। ऐसी स्थिति में सर्वाधिक सीटें भाजपा के खाते में जाने की तैयारी है। बताया जाता है कि 36 सदस्य चांसलर कार्यालय की ओर से मनोनीत किए जाएंगे। इन सभी सदस्यों पर भाजपा ग्रुप का कब्जा हो सकता है।
राजनीतिक पंडितों की राय... सुभाष को रहना चाहिए अलग
कुछ राजनीतिक पंडितों का कहना है कि पीयू के तमाम शिक्षकों की ओर से आवाज आ रही है कि इस बार भी सुभाष शर्मा ग्रुप को गोयल ग्रुप से समझौता नहीं करना चाहिए। वह इसलिए गोयल ग्रुप का लंबे समय से सीनेट व सिंडिकेट में प्रभाव रहा है। कुछ ऐसे शिक्षक हैं जिनके कार्य आज तक नहीं हो पाए हैं।
यदि सुभाष ग्रुप डीएवी को लेकर आगे बढ़ेगा तो उन शिक्षकों की समस्याओं का निराकरण होगा। उसके बाद सीनेट में भी नजारा बदलेगा। सूत्रों के अनुसार, सुभाष शर्मा ग्रुप को इस बार गोयल ग्रुप इसलिए मिलाना चाहता है कि सीनेट में फिर से वह अपना कब्जा जमा पाएं। हालांकि गोयल ग्रुप बिना सपोर्ट के भी काफी मजबूती के साथ खड़ा है।