सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा सीनियॉरिटी लिस्ट का है, जो अभी तक पीयू में बनी ही नहीं। जो बनी है उसमें कई खामियां हैं। कुछ प्रोफेसरों का कहना है कि बिना वरिष्ठता के ही लोगों को आगे बढ़ाया जा रहा है जबकि काबिल लोग पिछड़ रहे हैं।
एसोसिएट-असिस्टेंट प्रोफेसर्स का ये है मुद्दा
- पीयू में 100 से अधिक शिक्षक ऐसे हैं जो पास्ट सर्विस काउंट का लाभ नहीं ले पाए हैं। उन्हें ऐसा उम्मीदवार चाहिए जो इसका लाभ दिलाए।
- वर्ष 2014 के बाद से जिन शिक्षकों को नौकरी मिली उनको आवास तक पीयू में मुहैया नहीं हो पाए। वे चाहते हैं आवास मिले।
- कुछ शिक्षकों को आवास मिले भी हैं तो वह टपक रहे हैं। वह चाहते हैं जल्द इन्हें ठीक करवाया जाए
- मेडिकल पॉलिसी की लंबी प्रक्रिया से यह शिक्षक खुश नहीं हैं। यदि पीजीआई में किसी को इलाज मिला तो उसका रिफंड एक साल में जाकर मिलता है।
- इसके लिए औपचारिकताएं भी कई करनी पड़ती हैं। रिफंड भी 40 से 50 फीसदी तक कटकर मिलता है। शिक्षक चाहते हैं इसका हल।
कुछ शिक्षकों ने साफ कहा है कि सीनेट राजनीति का अखाड़ा बन गई है। यहां केवल ग्रुपबाजी, विचारधाराओं की लड़ाई रह गई है। यदि सीनेट इन चार सालों में पीयू की बेहतरी के लिए कार्य करती तो पीयू की रैंकिंग में बड़ा उछाल आता। हंगामे के सिवाय यहां कुछ नहीं होता। एक दूसरे को श्रेष्ठ साबित करने के लिए लड़ाई होती है। शिक्षकों का कहना है कि उनका समाज पढ़ा लिखा कहा जाता है।
इसलिए शिक्षक इस बार अपनी ताकत का अहसास कराएं और उन लोगों को सीनेट तक पहुंचाएं जो वाकई काबिल हैं और पीयू के लिए उनके पास कुछ विजन है। कुछ शिक्षकों की तो राय तो यह है कि जो लोग सीनेट में एक बार पहुंच चुके हैं उनसे किनारा किया जाए। बार बार सीनेट में जाने की इच्छा बताती है कि उनके कुछ न कुछ हित छिपे हुए हैं।