वहीं सुभाष ग्रुप पिछले तीन सालों से सीनेट में अधिक सक्रिय है। उन्होंने मुद्दों को करीब से उठाया और अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। काफी हद तक वह सफल भी रहे। बताया जाता है कि उनकी रणनीति के कारण ही डीएवी ग्रुप ने उनसे हाथ मिलाया था। डीएवी ग्रुप के पास अकेले 10 सीटें होती हैं जो अपने आप में काफी हैं।
सुभाष ग्रुप इस बार भी दिग्गज खिलाड़ियों के साथ मैदान में उतरा है। वह चुनाव भी लड़ेंगे और दूसरा चांसलर कार्यालय से अधिकतर मनोनीत सदस्य अपने लेकर आएंगे। मनोनीत सदस्यों की संख्या 32 है। ऐसे में यदि पूरे सदस्य सुभाष ग्रुप के मनोनीत होकर आते हैं तो उससे उन्हें लाभ मिल सकता है। इस बार लड़ाई एकतरफा नहीं है, क्योंकि मनोनीत सदस्यों को लेकर सुभाष ग्रुप का पलड़ा भारी है। वहीं गोयल ग्रुप स्नातक, पीयू कैंपस व कॉलेजों की सीटों पर अपना प्रभाव रखता है। इस तरह सीनेट में बहुमत बनाने में एक या दो ही सीटों का अंतर रहेगा।