पंजाब के सियासी इतिहास में यह पहला मौका है, जब कोई सरकार एक साथ चार उप चुनाव कराने जा रही है। इतनी ज्यादा संख्या में उप चुनावों ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ये उप चुनाव सरकार की अग्नि परीक्षा बन गए हैं। शिअद सुप्रीमो सुखबीर बादल और केंद्रीय राज्यमंत्री सोम प्रकाश के लोकसभा में जाने के बाद जलालाबाद और फगवाड़ा सीटें खाली हुई थीं। सरकार इन दोनों पर ही चुनाव करवाना भी चाहती थी। ताकि आसानी से दबाव और मशीनरी का प्रयोग किया जा सके।
आम आदमी पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टियों में गए विधायकों पर इसी लिए कोई फैसला नहीं किया जा रहा था। दाखा के विधायक एचएस फूलका ने चेतावनी दे दी कि अगर उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया तो वह सुप्रीम कोर्ट चले जाएंगे। आनन-फानन में लंबे समय से लटका इस्तीफा आखिर मंजूर कर लिया गया। मुकेरियां के विधायक रजनीत बब्बी के आकस्मिक निधन से एक और सीट खाली हो गई। अब चारों उप चुनाव एक साथ ही हरियाणा विधानसभा चुनाव के साथ होंगे। चार जगह लड़ाई लड़ना आसान नहीं है।
सरकार की ताकत बंट जाएगी। जलालाबाद जैसी हाई प्रोफाइल सीट के लिए तो कांग्रेस के पास मजबूत उम्मीदवार तक नहीं है। मुकेरियां में भी कोई लीडरशिप तैयार नहीं की गई थी। इन चारों में पार्टी के पास सिर्फ एक ही सीट थी। कांग्रेस के लिए समस्या यह है कि अगर एक सीट भी हारी, तो काफी फजीहत होगी। साथ ही उसका असर अगले विधानसभा चुनावों पर भी पड़ेगा। इसे लेकर पार्टी में गंभीर मंथन चल रहा है।