खान-पान और रहन-सहन में बदलाव कर बांझपन जैसी स्थिति से खुद को बचाया जा सकता है। यह महिला और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू हो रहा है। इस बढ़ते मर्ज पर काबू पाने के लिए पीजीआई के विशेषज्ञ दवाओं के साथ जीवन शैली में बदलाव कर दंपतियों को संतान सुख दिला रहे हैं।
प्रो. शालिनी ने बताया कि संस्थान में लगभग 18 साल से इनफर्टिलिटी क्लीनिक का संचालन हो रहा है। इसमें सोमवार से शनिवार प्रतिदिन न्यू ओपीडी के रूम नंबर 2046 में इन मरीजों को परामर्श दिया जा रहा है। ओपीडी में प्रतिदिन 90 से 100 मरीज आ रहे हैं। इसमें महिला-पुरुष का अनुपात 30 और 70 का है। प्रो. शालिनी ने बताया कि पीजीआई में आईवीएफ पर कुल 70 से 80 हजार रुपये का खर्च आ रहा है। इसमें 40 हजार रुपये फीस है। इसके अलावा दवा और इंजेक्शन पर लगभग 30 से 40 हजार रुपये का खर्च आता है।
प्रो. शालिनी ने बताया कि संतान की उम्मीद रखते-रखते काफी केस में इतनी देरी हो चुकी होती है कि उन्हें तकनीक का भी लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे में जरूरी है कि डॉक्टर की सलाह पर बिना देरी किए इलाज शुरू कराएं। प्रो. शालिनी का कहना है कि अन्य जगहों के चक्कर काटकर पीजीआई में मरीज काफी देर से पहुंच रहे हैं, जिसके कारण आईवीएफ की सफलता दर पर असर पड़ रहा है। युवावस्था वाले केस में सफलता दर 40 से 45 प्रतिशत और ज्यादा उम्र वाले में 20 प्रतिशत है। बांझपन की समस्या इतनी ज्यादा बढ़ रही है कि पीजीआई में मौजूदा समय में आईवीएफ के लिए 60 से 70 की वेटिंग चल रही है।
बांझपन शुक्राणु की गुणवत्ता प्रभावित होने और स्पर्म काउंट कम होने के कारण होती है। जिसके कारण अंडों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। इन सभी कारकों की वजह से धीरे-धीरे बांझपन की समस्या शुरू होने लगती है। इसके अलावा पुरुष और महिलाओं दोनों में ही बांझपन के लिए कई अलग-अलग कारण भी जिम्मेदार होते हैं।
वर्ष विभाग पुरुष/महिला