साल 2014 में भाजपा को जाटों का 25-30 फीसदी वोट मिला था। मगर 2019 के चुनाव में वोट शेयर घट गया। यही वजह है कि पिछले विधानसभा चुनाव में जाटों की नाराजगी का पार्टी को नुकसान भी झेलना पड़ा था। भाजपा के धुरंधर जाट नेता कैप्टन अभिमन्यु, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओपी धनखड़, सुभाष बराला और प्रेमलता को हार का मुंह देखना पड़ा। पॉलिटिक्स ऑफ चौधर के लेखक सतीश त्यागी कहते हैं कि 10 से 15 फीसदी जाट वोट अब भी भाजपा के साथ हैं।
सरकार में मंत्री भी हैं। मिमिक्री विवाद को पार्टी इसलिए भुनाने की कोशिश में है, ताकि उसे जाट समुदाय का 15 से 20 फीसदी और वोट मिल जाए। यदि पार्टी को यह वोट शेयर मिलता है तो उसकी जीत आसान हो जाएगी और उसे किसी का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। अब भाजपा मिमिक्री विवाद के जरिये जाट वोट बैंक को दोबारा से अपने साथ जोड़ने की कोशिश में जुटी है।
वहीं, मिमिक्री विवाद के बाद बैकफुट पर खड़ी कांग्रेस को पहलवानों के मुद्दों से उम्मीद जगी है। कांग्रेस साक्षी के कुश्ती छोड़ने के मुद्दे को जाटों के अपमान से जोड़ रही है। एक तरह से कांग्रेस की मजबूरी भी है। हर चुनाव में दूसरी पार्टियों के मुकाबले कांग्रेस को जाट वोट शेयर ज्यादा मिलता रहा है। अगर वह पहलवानों के साथ नहीं खड़े होंगे तो उनके खिलाफ नाकरात्मक संदेश जा सकता है।
इसलिए हरियाणा के कांग्रेस नेता पहलवानों के साथ खड़े हैं। किसी समय दीपेंद्र हुड्डा हरियाणा कुश्ती संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं। पहलवानों के साथ भी उनके अच्छे रिश्ते हैं। सीएसडीएस-लोकनीति के मुताबिक साल 2014 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जाट समुदाय का 21 फीसदी वोट मिला और वहीं, 2019 में यह वोट शेयर 12 फीसदी बढ़ा।