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एसवाईएल के लिए लड़ाई लड़ने को सभी सियासी दल एकजुट, भाकियू के सेमिनार में नहीं आई कांग्रेस

Thu, 01 Aug 2019 09:56 AM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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सतलुज युमना लिंक नहर - फोटो : फाइल फोटो
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सतलुज यमुना लिंक नहर के मुद्दे पर सभी सियासी व अन्य संगठन मिल कर लड़ाई लड़ने को तैयार हैं, लेकिन सेमिनार में कांग्रेस का कोई प्रतिनिधि नहीं आया। वहीं सियासी दलों ने भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) की ओर से आयोजित सेमिनार में इस पर सहमति जताई। यूनियन ने अगली रणनीति तय करने को सात अगस्त को बैठक बुला ली है।
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प्रधान बलबीर सिंह राजेवाल की अगुवाई में हुए सेमिनार में सत्ताधारी कांग्रेस का कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि पंजाब और हरियाणा से बातचीत कर एसवाईएल बनवाने के बारे में तीन सितंबर को रिपोर्ट दे। इसे लेकर मचे सियासी कोहराम के बीच हुए सेमिनार में माहिरों ने सभी पक्ष रखे।

सीनियर वकील राजविंदर बैंस ने 1955 से अब तक जारी आदेशों और समझौतों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने तथ्यों के आधार पर कहा कि किसी भी राज्य का पंजाब की नदियों के पानी में कोई हक नहीं है। पीएयू के डॉ. एसएस कक्कल और डॉ. अजमेर सिंह बराड़ ने कहा कि हमारे 109 ब्लॉकों में पानी खत्म होने के कगार पर है। दो ब्लॉकों में तो खत्म ही हो गया है।
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अर्थशास्त्री डॉ. रणजीत सिंह घुम्मन ने कहा कि नहरी सिंचाई के अधीन पंजाब का रकबा लगातार घट रहा है।

 
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दूसरे सेशन में अकाली दल के डॉ. दलजीत चीमा ने सरकारी पत्रों के आधार पर अपनी पार्टी का पक्ष रखा। आप के कुलतार संधवां, भाजपा के हरजीत गरेवाल ने भी सेशन को संबोधित किया। सभी का कहना था कि पंजाब की नदियों के पानी के लिए सब एकजुट होकर लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। राजेवाल ने बताया कि इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को एक-एक लाख पत्र लिखे जा रहे हैं। सात को संगठन की बैठक में अगली रणनीति फाइनल कर दी जाएगी।

सियासतदानों में नोकझोंक
सेमिनार के दौरान सियासतदानों के बीच हल्का-फुल्का नोकझोंक हुई। कुलतार संधवां ने कहा कि एसवाईएल केलिए शिरोमणि अकाली दल जिम्मेदार है। सबसे पहले प्रकाश सिंह बादल ने हरियाणा से नहर के निर्माण को एक करोड़ का चेक लिया था। डॉ. दलजीत चीमा ने सबूत दिखाए कि चेक ज्ञानी जैल सिंह ने लिया था। उनकी दलील थी कि शिअद ने हमेशा पानी के लिए लड़ाई लड़ी है। दूसरे वक्ताओं ने कहा कि अगर ऐसा था तो फिर हरचंद सिंह लौंगोवाल ने समझौता क्यों किया, गलती शिअद की भी है।
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