करीब 27 साल तक कारपोरेट जगत में काम किया। एक मंजिल तक पहुंचा। अच्छा पैकेज व सुविधाएं मिल रही थीं लेकिन महसूस हुआ कि अब समय आ गया है कि कुछ काम समाज के लिए भी किया जाए। शुरुआत कहां से हो, इसे लेकर थोड़ी दुविधा थी। हालांकि शुरू से ही मैं अच्छा वक्ता था। ऐसे में परिवार व दोस्तों से राय ली।
इसके बाद मैंने मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर व मैनेजमेंट गुरु बनने की राह चुनी। यह कहानी है गिरीश आनंद की। जो इस पथ पर चलते हुए उत्तरी भारत में बचपन बचाने से लेकर पढ़े-लिखे डिप्रेशन में डूबे सैकड़ों लोगों को रोजाना राह दिखा रहे हैं। इसके अलावा एक जागरूक नागरिक होने के चलते वह कुछ गलत होता देख तुरंत उसे संबंधित अथारिटी तक पहुंचाते हैं।
शिक्षकों की कमियां सुधारीं, क्लासरूम का फोबिया किया खत्म
गिरीश आनंद का कहना है कि काफी समय पहले उनके ध्यान में आया कि आज देश का बचपन बिल्कुल सुरक्षित नहीं है। देश में चाइल्ड एब्यूज काफी बढ़ गया है। यह समस्या हर वर्ग के बच्चों को फेस करनी पड़ रही है। इसके लिए उन्होंने काफी रिसर्च के बाद एक प्रोग्राम बनाया जिसमें बच्चों की भावुकता को छेड़े बिना उनकी मासूमियत को बचाया जा सके।
इसके बाद उन्होंने बच्चों को गुड टच और बैड टच के बारे में जागरूक किया। फिर उन्होंने शिक्षकों की कमियां सुधारने व क्लासरूम को रुचिकर बनाने की दिशा में काम करते हुए क्लासरूम फोबिया भी खत्म किया।