2017 में वाल्मीकि समाज की वोट लेकर पंजाब की सत्ता हासिल करने वाली कांग्रेस सरकार की तरफ से दोआबा में किसी भी वाल्मीकि समाज के नेता को प्रतिनिधित्व न दिये जाने से समुदाय के अंदर नाराजगी भारी पड़ने लगी है। कांग्रेस की परंपरागत वोट बैंक की नाराजगी को लेकर दोआबा में अकाली दल और आप ने तेजी से सक्रियता बढ़ा दी है, ताकि कांग्रेस से खिसकने वाले वोट बैंक को लपक लिया जाये।
हाल ही में शिअद सुप्रीमो सुखबीर बादल व आप नेता हरपाल चीमा ने इस पर अपनी अपनी टीम को टिप्स देकर मैदान में उतार दिया है। दोनों पार्टी नेताओं ने दोआबा के वाल्मीकि समाज के प्रमुख नेताओं से मीटिंग का सिलसिला अंदरखाते शुरू कर दिया गया है। 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले टिकट वितरण में जातीय संतुलन न बैठने के कारण वाल्मीकि, मजहबी सिख समाज नाराज हे गया था।
दोआबा की कुल आबादी में 37 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति की है। इनमें रविदास बिरादरी और वाल्मीकि-मजहबी सिख समाज प्रमुख हैं। 2002 में दोआबा के एससी वोट बैंक ने कांग्रेस का साथ दिया तो पार्टी ने सरकार बनाई। लेकिन 2007 और 2012 में यह वोट बैंक कांग्रेस से टूटकर अकाली दल भाजपा की तरफ चला गया, तो पार्टी भी सत्ता से दूर हो गई। दोनों चुनावों में दोआबा में पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। इस कारण कैप्टन सत्ता से दूर रहे।