करवा चौथ का व्रत गुरुवार को है। यह चंडीगढ़ की सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद शुभ और खास है। उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। चंडीगढ़ की राशि मीन है। मीन का स्वामी गुरु हैं। यह विशेष संयोग है।
इस वर्ष करवा चौथ पर शुभ योग बन रहा है। कृतिका और रोहिणी नक्षत्र के साथ सिद्धि योग बन रहा है। इसके साथ चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में होंगे। ऐसा योग बनने पर पूजा एवं व्रत का फल और बढ़ जाता है। यह योग सुख समृद्धि और शांति का प्रतीक है। यह बात देवालय पूजक परिषद के संरक्षक और सेक्टर 28 के श्री खेड़ा शिव मंदिर के पुजारी आचार्य ईश्वर चंद्र शास्त्री ने कही।
उन्होंने बताया कि कार्तिक मास को त्योहारों का महीना बताया गया है। शरद पूर्णिमा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक त्योहार ही हैं। इस दौरान विवाहित महिलाएं करवा चौथ का व्रत भी धूमधाम से मनाती हैं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन यह व्रत किया जाता है।
यह व्रत औरतों के लिए विशेष होता है। हर हिंदू स्त्री अपने पति के सुख-समृद्धि एवं दीर्घायु के लिए और वैवाहिक जीवन सुखी रहने के लिए यह व्रत करती हैं। इस व्रत के अधिष्ठाता देवता श्री गणेश, शिव एवं पार्वती हैं। सूर्योदय से शाम को चंद्र दर्शन तक निराहार व निर्जल रहकर महिलाएं यह व्रत करती हैं। रात्रि में चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य के बाद व्रत का पारण किया जाता है। कन्याएं भी अपने भविष्य में सुंदर घर वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं।
इस बार नहीं होगा व्रत का उद्यापन
श्री देवालय पूजक परिषद के अध्यक्ष और सेक्टर 18 के श्री राधा कृष्ण मंदिर के पुजारी डॉ. लाल बहादुर दुबे ने बताया कि जिन्होंने करवा चौथ के व्रत का उद्यापन करना है तो वह इस बार व्रत का उद्यापन नहीं कर सकती हैं। क्योंकि शास्त्र की आज्ञा है कि जब शुक्र अस्त होता है तो किसी भी व्रत का उद्यापन नहीं किया जा सकता।
पूजन विधि
ईश्वर चंद्र शास्त्री ने बताया कि इस व्रत में करवा चौथ की कथा सुनना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि किसी नजदीक मंदिर में जाकर ब्राह्मण के मुख से कथा सुनना चाहिए अथवा अपने घर में ब्राह्मण को बुलाकर उनसे कथा सुनें। गणेश गौरी की पूजा करें एवं रात्रि में चंद्रमा के दर्शन करने एवं अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण करें।
चंद्रोदय रात 8 बजकर 10 मिनट पर होगा
इस बार करवा चौथ पर 13 अक्तूबर को रात्रि में 8 बजकर 10 मिनट पर चंद्रमा का दर्शन होगा अर्थात चंद्रोदय होगा। चंद्रमा के दर्शन एवं अर्घ्य देने के बाद ही इस व्रत का पारण करना चाहिए।