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गंगाजल जैसा होता था कभी इस तालाब का पानी

Sun, 24 Aug 2014 04:12 PM IST
राजकुमार भारद्वाज/अमर उजाला, बेरी
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सामाजिक कार्यकर्ता पीतांबर बेरी के एकदम प्रवेश के निकट स्थित तालाब की बात शुरू होते ही कहते हैं- भाईसाहब पहले गंगासर से घांघसर और इब गंदासर बणा दिया हमनै। बेरी में घुसते ही गऊशाला के साथ स्थित है ऐतिहासिक पौराणिक मंदिरों से घिरा गंगासर तालाब। लोग अब इसे घांघसर कहने लगे हैं। हरियाणा के तालाबों पर शुरू की गई सीरीज के लिए पीतांबर अमर उजाला का आभार जताते हैं।
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बेरी में इस तालाब का अलग महत्व था। वह इसलिए कि इस तालाब का गऊ घाट गोशाला में खुलता था। 75 साल की मूर्ति देवी बताती हैं, सैकड़ों की संख्या में गाएं जब एक साथ तालाब पर आती थीं तो अद्भुत दृश्य होता था और लगता था कि गंगासर गायों के चरण धो रहा है। फटवाडि़या मोहल्ले के विजय कुमार के मुताबिक, इस सरोवर का गंगाजल सा पानी औषधीय दृष्टि से बहुत उपयोगी था।

लोग यहां अपने रोग और पाप दोनों धोते थे। घरों में पूजा के समय जब गंगाजल नहीं मिलता था तो हम गंगासर का जल छिड़ककर शुद्धि करते थे। जब कोई भूल हो जाती थी या कोई रोग हो जाता था तो मरी मां कहती थी, जा गंगासर म्ह नहाकै पतासे बांट आइए (यानी गंगासर में स्नान करके प्रसाद बांट देना)।
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दुर्भाग्य है कि अब यह तालाब अपना स्वरूप पूरी तरह खो चुका है। गऊ घाट पर भी अब लोगों का कब्जा हो गया है। तालाब दो ओर से पाटा जा रहा है। इस पर प्लॉट काट दिए गए हैं। नतीजतन मिट्टी से पाटने के बाद तालाब सिकुड़ गया है और इसका मूल स्वरूप गायब हो गया है।

तालाब के नैसर्गिक चरित्र का तो लोगों ने कई वर्ष पहले हनन कर लिया था। इस पर बने पांच बहुत खूबसूरत कुओं के केवल निशान बचे हैं। गांव के सेठों ने भी कई कुएं बनवाए। सारे छाज्याणों ने मिलकर तालाब के किनारे 10 भौंण का कुआं खुदवाया।

तकरीबन 166 साल पहले भिवानी जिले के तिगड़ाना गांव के सेठ सरिया बेरी आए। कुछ समय बाद ही वे बेरी के नामी सेठ हो गए। उनके बेटों ने गंगासर पर उनकी स्मृति में एक मंदिर बनवाया। तालाब का एक घाट इसी मंदिर पर स्थित है और लोग इसे तिगड़ाना वालों का घाट बोलते हैं।

इसी तरह पंचमुखी मंदिर वाला घाट, इमली वाले हनुमान जी का घाट अब निशान के तौर पर बचे हैं। हर घाट की पौडि़यां तकरीबन पौना फुट ऊंची और तीन फुट चौड़ी थीं। अब तालाब में जलघास उग आई है। वह अब जलधास का तालाब लगता है और गांव के गंदे पानी का गटर है। पीतांबर कहते हैं- इब इसका रुखाला तो राम भी नहीं रह्या।

यह तालाब न केवल गऊशाला की गायों की प्यास बुझाता था बल्कि गांव में भूजल स्तर को भी ऊंचा रखता था। बुजुर्ग गजनूप सिंह के मुताबिक इस यह तालाब छाज्याण पाने (मोहल्ले) की शान था और छाज्याणों ने इसे गांव की ओर 10 मीटर से अधिक गहरा तक खोद दिया था।

बेरी का एक बड़ा हिस्सा काफी ऊंचाई पर बसा है लेकिन चारों ओर बने तालाबों के निर्माण में इस बात का खासा ध्यान रख गया था कि गांव में कभी बाढ़ का खतरा पैदा ही न हो। बकौल पीतांबर, इस तालाब को गहरा करने के पीछे बाढ़ से बचाव भी एक बड़ा कारण था। तालाब देखकर हम वापस मुख्य चौराहे की ओर लौटते हैं। यहां बोतलबंद पानी की बिक्री होते देख याद आती है कहावत, नदिया बिच मीन पियासी।
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