हरियाणा में हवा किसकी है? यह सवाल आजकल लगभग सबकी जुबां पर है। लेकिन, इसका जवाब न पार्टी नेताओं के पास है और न मीडिया के पास। प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए वोटिंग के सिर्फ एक महीना बचा है, लेकिन सभी दल अपने कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में उत्साह की कमी से जूझ रहे हैं।
केवल सोशल मीडिया के सहारे माहौल बनाने के भरोसे बैठे संभावित प्रत्याशियों के सामने अब पब्लिक मीटिंग में भीड़ जुटाने की चुनौती खड़ी हो गई है। न बाजारों में चुनाव की चर्चा है और न पार्कों में मुद्दों पर तीखी बहस देखी जा रही है।
आपको हम रोहतक, सोनीपत और जींद जैसे सबसे ज्यादा राजनीतिक सक्रिय माने जाने वाले जिलों का परिदृश्य बताते हैं। आप खुद समझ जाएंगे कि प्रत्याशियों और संभावित उम्मीदवारों के चेहरे पर हवाइयां क्यों है। सबसे पहले प्रदेश की सियासी राजधानी रोहतक का हाल। शनिवार को एक दल ने अपनी पार्टी के पूर्व पार्षदों की बैठक बुलाई। उद्देश्य वही, पार्टी प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदारी देनी थी। नेता मंच पर मौजूद। पूर्व मेयर भी खुद मुस्तैदी से पहुंचे। लेकिन, पार्टी से जुड़े एक तिहाई पूर्व पार्षद नहीं पहुंचे। इंतजार करते थक गए तब नेताजी ने इन पार्षदों के मीटिंग में न पहुंचने का कारण भी बतवा दिया।
यहीं, मुख्य प्रतिद्वंद्वी माने जा रहे दूसरे दल की स्थित समझिए। वह दल अब तक प्रत्याशी ही घोषित नहीं कर सका है। ऐसे में संभावित प्रत्याशी महोदय कई इलाकों में दोबार भी डोर-टू-डोर करने की स्थिति में आ चुके हैं। उनकी मीटिंग के लिए बैनर-पोस्टर भी तभी बन सकेंगे जब पार्टी प्रत्याशी घोषित करेगी। ऐसे में उनके समर्थक खुद अपने वीडियो बनवाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं। तीसरे और चौथे दल के बारे में तो कहीं चर्चा तक नहीं है। इन दोनों दलों के तो संभावित प्रत्याशी भी अभी तक कोई पब्लिक मीटिंग करते नहीं नजर आएंगे।
सोनीपत में सियासी पारा चढ़ने के बजाय और चुनाव तिथि निकट नजदीक आने के साथ और ठंडा होता जा रहा है। एक ओर, जिस प्रमुख दल ने अपना प्रत्याशी मैदान में उतार दिया है, उसका जगह-जगह विरोध हो रहा है। दूसरी ओर, प्रत्याशी के समर्थकों को यह पता ही नहीं है कि विरोध करने वालों को किस प्रतिपक्षी नेता का निकट बताना है। ऐसे में प्रचार करना और प्रतिद्वंद्वी पर हमला बोलना, दोनों काम नहीं हो पा रहे हैं। चूंकि नए प्रत्याशी सांसद न रहे हैं और न लोकसभा चुनाव लड़े हैं, इसलिए कई जिलों में फैले अपने क्षेत्र में कार्यकर्ताओं को जुटाना बड़ा काम लग रहा है। पार्टी के कार्यकर्ताओं में उत्साह कम होने का आलम यह है कि बड़े नेताओं के कार्यक्रमों में पड़ोसी जिलों से कार्तकर्ताओं को लाना पड़ रहा है।
जींद का रणक्षेत्र सबसे मुश्किल होता जा रहा
पार्टी प्रत्याशी जहां कार्यकर्ताओं की बेरुखी से जूझ रहे हैं, वहीं दल जींद की गजब भौगोलिक स्थिति से परेशान हैं। दलों के बड़े नेता एक विधानसभा क्षेत्र में कोई वादा करते हैं तो दूसरे क्षेत्र के लोग नाराज हो जाते हैं। दोनों विधानसभा क्षेत्र अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र में होने से दोनों के प्रत्याशियों को बैकफुट पर आना पड़ता है। ऐसा ही अभी सफींदो के प्रस्तावित पैरामेडिकल कॉलेज को जींद ले जाने के मामले में हुआ।
भाजपा नेता इसे तकनीकी कारणों से बदलाव करार दे रहे हैं तो प्रतिद्वंद्वी इसे सफीदों से धक्का करार दे रहे हैं। नरवाना में अगर कोई वादा किया जाता है तो उसका संबंध सिरसा लोकसभा क्षेत्र से हो जाता है। उचाना विधानसभा क्षेत्र के लिए किया गया कोई वादा हिसार लोकसभा क्षेत्र के उम्मीदवारों का नफा-नुकसान तय करता है। जींद जिले के कार्यकर्ताओं के नेताओं और कार्यकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह किसके लिए वोट मांगे या किसके विरोध में वोट मांगे। यहां जिन तीन लोकसभा सीट के मतदाता हैं वहां सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी दल ने उम्मीदवार घोषित नहीं किए हैं।
हर मीटिंग के मंच पर वही चेहरे, सुनने वाले वही और कुर्सियां खाली
पार्टी के कार्यकर्ताओं में निरुत्साह देखना हो तो किसी दल की तीन-चार मीटिंग का नजारा ले लीजिए। हर जगह मंच पर वही नेता दिखेंगे जो पहले की या कल की मीटिंग में भी मौजूद थे। सामने कार्यकर्ता वही दिखेंगे जो पिछले तीन इलाकों की मीटिंग में मौजूद थे। हर मीटिंग में कुर्सियां खाली दिखेंगी। इसीलिए अब स्थानीय नेताओं की जनसंपर्क टीमें वही फोटो अखबारों में छपवाना चाहती हैं जो उन्होंने उपलब्ध कराई हैं। वही वीडियो वायरल किए जा रहे है जो संभावित उम्मीदारों की सोशल मीडिया टीम ने तैयार किए हैं। सही तस्वीर दिखाने में प्रत्याशियों और संभावित प्रत्याशियों के पसीने छूट रहे हैं क्योंकि रैलियां अब बैठक में तब्दील होती जा रही हैं।