पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार के रहते पंजाब में अकालियों और भाजपा के बीच गठबंधन हुआ है। शिअद (बादल) की अगुवाई में 1996 के लोकसभा चुनाव मैदान में उतरे 13 अकाली उम्मीदवारों में से आठ ने जीत हासिल की थी। इन अकाली सांसदों के साथ प्रकाश सिंह बादल दिल्ली स्थित पंजाब भवन पहुंचे थे।
तब केंद्र में एचडी देवगौड़ा की अगुवाई में सरकार बनाने की कवायद हो रही थी। इस सरकार का हिस्सा बनने के लिए एसजीपीसी के तत्कालीन अध्यक्ष जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहरा, पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला और नवनियुक्त सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने देवगौड़ा से मुलाकात की थी। इस बात की बादल को जानकारी नहीं थी। इन तीनों अकाली नेताओं की तरफ से देवगौड़ा सरकार का हिस्सा बनने के लिए प्रयास तेज किए जा रहे हैं, इसकी भनक कभी ज्ञानी जैल सिंह के सचिव रहे तरलोचन सिंह को लगी।
अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन रहे तरलोचन सिंह तत्काल पंजाब भवन पहुंचे और बादल को इस बारे में जानकारी दी। इसके बाद बादल ने तरलोचन सिंह से पूछा कि कौन सा रास्ता चुना जाए। तरलोचन सिंह ने बादल से कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी से मेरी अच्छी घनिष्ठता है, उनसे बातचीत की जा सकती है।
बादल ने बिना शर्त दिया था उस समय की भाजपा सरकार को समर्थन
तरलोचन सिंह के अनुसार, वह बादल के साथ वाजपेयी के घर गए। वाजपेयी ने बादल से कहा कि वह अकालियों का साथ चाहते हैं, जिसके बाद बादल ने वाजपेयी को समर्थन देने का वायदा किया। बादल पंजाब भवन लौटे, बाकी तीनों अकाली नेता भी वहां आए। उन्होंने बादल से आग्रह किया कि अकाली दल को देवगौड़ा की सरकार में शामिल होना चाहिए।
बादल ने तीनों अकाली नेताओं को स्पष्ट कर दिया कि जिस सरकार को कांग्रेस का समर्थन होगा, अकाली उस सरकार में शामिल नहीं होंगे। अकाली वाजपेयी सरकार का समर्थन करेंगें। उसी दिन वाजपेयी ने अपने घर रखे एक रात्रि भोज में भी बादल को बुलाया था। वहां भी बादल और वाजपेयी के बीच लंबी बातचीत हुई थी।
केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का गठन हुआ, जो मात्र 13 दिन चली। बाद में देवगौड़ा और इंदर कुमार गुजराल की सरकारों का गठन हुआ। इन दोनों प्रधानमंत्रियों ने अकाली दल से समर्थन मांगा था, लेकिन बादल ने स्पष्ट कह दिया था कि उनका समर्थन भाजपा सरकार को है और यह समर्थन बिना शर्त दिया गया था।
तत्कालीन जनसंघ नेताओं के साथ थी बादल की गहरी दोस्ती
भाजपा को समर्थन का आधार पंजाब में 1967 और 1977 में गठित गैर कांग्रेसी सरकारों में शामिल जनसंघ के नेताओं और बादल के बीच की दोस्ती भी थी। आपातकाल में जेलों में बंद अकाली-तत्कालीन जनसंघ के नेताओं के बीच तालमेल बढ़ा था। बादल की जनसंघ के बड़े नेता डॉ. बलदेव प्रकाश, हिताभिलाषी और बलराम दास टंडन जैसे नेताओं के साथ गहरी पटती थी।
इसी कारण बादल का झुकाव भाजपा की तरफ अधिक था। भाजपा के साथ समझौता कर बादल ने 1997 में पहला विधानसभा चुनाव लड़ा। लगभग 20 साल बाद बादल ने दूसरी बार प्रदेश की सत्ता संभाली थी। इसी दौरान जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहरा के साथ पैदा हुए टकराव के बाद 18 अकाली विधायकों ने बादल का साथ छोड़ दिया था लेकिन भाजपा ने बादल का डट कर साथ दिया।
इससे समझौते की जड़ें मजबूत होती गई। अकाली दल में सुखबीर बादल, हरसिमरत कौर और बिक्रम मजीठिया के ताकतवर होने के बाद भाजपा के साथ पैदा हुए टकराव में यह समझौता धीरे-धीरे कमजोर हो गया। आखिर में किसानों के मुद्दे पर अकाली दल को अलग होने का बहाना मिल गया, ताकि वह अपना वोट बैंक बचा सके।