पनाग का कहना है कि स्पोर्ट्स के जरिए अनुशासन सिखाया जा सकता है। वह खिलाड़ियों की बहुत इज्जत करती हैं। जो अनुशासन या लगनशीलता खेल से आती है, वह कहीं और से नहीं आ सकती। खेल में हार भी होती है और जीत भी। हार को मोटिवेशन में बदलकर आगे बढ़ने का मौका मिलता है।
शेखी से ही बन गई मिस इंडिया
गुल पनाग ने कहा कि उन्होंने और उसके भाई ने खूब शेखी बघारी है। इतनी कहानियां बनाई हैं कि बता नहीं सकती। माता-पिता ने हालांकि कभी हमारी पोल नहीं खोली। कुछ किस्सागोई होती है, कुछ कल्पनाएं होती हैं। जब वह छोटी थी तो कहती थी कि मिस इंडिया बनेगी। जब वह 15 साल की हुई तो परिवार के लोग बोलते थे जब मिस इंडिया बन जाओ तो तब ये करना। इससे परिवार में एक माहौल बन गया और एक दिन वह इस लक्ष्य को पा गई।
पिता से सीखा लक्ष्य का पीछा करना
पनाग ने कहा कि वह यहां तक अपने पिता की वजह से पहुंची हैं। उनका अनुशासन हमने अपने जीवन में अपनाया है। लक्ष्य का पीछा करना इन्हीं से सीखा है। सेना के माहौल ने हमें अनुशासन दिया। पिता ने वह अनुशासन हम पर कायम रखा। इनका अनुशासन हमारे लिए सबसे बड़ी सीख है।